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बसंत कुमार शर्मा
  • Male
  • जबलपुर, मध्यप्रदेश
  • India
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बसंत कुमार शर्मा commented on atul kushwah's blog post मेरे किरदार को ऐसी कहानी कौन देता है...
"आदरणीय  atul kushwah  जी सादर नमस्कार  बहुत बढ़िया गजल बधाई आपको "
4 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार  आपकी हौसलाफजाई का शुक्रिया "
23 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल
"आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन। खूबसूरत सदाबहार गजल के लिए हार्दिक बधाई।"
yesterday
बसंत कुमार शर्मा commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय धामी जी सादर नमस्कार  अद्भुत गजल हुई है आदरणीय  आनंद आ गया "
yesterday
बसंत कुमार शर्मा commented on Sushil Sarna's blog post मन पर दोहे ...........
"आदरणीय सादर नमस्कार, उत्तम दोहे हुए हैं आपके, बधाई  एक दोहे में लय भंग हो रही है, यदि उचित लगे तो यों कर सकते हैं  केसे मन का हो भला , बुझे न मन की प्यास ।4।"
yesterday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल
"आदरणीय Aazi Tamaam जी सादर नमस्कार  आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया "
yesterday
Aazi Tamaam commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल
"भाव पूर्ण सुंदर ग़ज़ल है सादर प्रणाम अदर्णीय बसंत जी बधाई स्वीकार करें"
yesterday
बसंत कुमार शर्मा posted a blog post

यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल

मापनी  १२२२ १२२२ १२२२ १२२  धवल हैं वस्त्र, नीयत के मगर गंदे बहुत हैं चिरैया देख! दाने कम उधर फंदे बहुत हैं  मचा है शोर मँहगाई का चारों ओर लेकिन यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं  जहाँ है खुरदुरा अज्ञान से मन का धरातल वहीं समतल बनाने ज्ञान के रंदे बहुत हैं  इसे हम भाग्य समझें या कहें अन्याय तेरा,  कहीं लाले मजूरी के, कहीं चंदे बहुत हैं बदलते रंग गिरगिट सा तुहारा नाम लेकर यहाँ पर काम के कम नाम के बंदे बहुत हैं"मौलिक एवं अप्रकाशित" See More
Monday
बसंत कुमार शर्मा commented on सालिक गणवीर's blog post ( बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे......(ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन ।अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई "
Monday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सादर नमस्कार आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया "
Monday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ख़ूबसूरत ग़ज़ल पेश की है आपने दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।"
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार आपका स्नेह मिला सृजन सार्थक हुआ  सादर नमन आपको "
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । बहुत ही मनभावन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीय Aazi Tamaam जी सादर नमस्कार  आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया "
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on Aazi Tamaam's blog post नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी
"आदरणीय अमीर जी सादर नमस्कार  बहुत बढ़िया गजल "
Saturday
Aazi Tamaam commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"अच्छी ग़ज़ल हुई है बेहद मधुर लयबद्ध किया गया है सादर प्रणाम आदरणीय बसंत जी बधाई स्वीकारें"
Saturday

Profile Information

Gender
Male
City State
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
Native Place
धौलपुर
Profession
भारतीय रेल यातायात सेवा
About me
बोन्साई एवं कविता लेखन में रूचि

बसंत कुमार शर्मा's Blog

यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल

मापनी  १२२२ १२२२ १२२२ १२२ 

 

धवल हैं वस्त्र, नीयत के मगर गंदे बहुत हैं 

चिरैया देख! दाने कम उधर फंदे बहुत हैं 

 

मचा है शोर मँहगाई का चारों ओर लेकिन 

यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं 

 …

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Posted on April 19, 2021 at 12:35pm — 4 Comments

रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल

मापनी  २१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

उपवनों में फूल कलियाँ तितलियाँ दिखतीं नहीं 

रोज कोयल खोजती अमराइयाँ दिखतीं नहीं 

 

हो गई आँखों से ओझल ऋतु बसंती प्यार की

तप रहा मन का मरुस्थल बदलियाँ दिखतीं नहीं

 

कौन सा यह आवरण ओढ़ा हुआ है आपने…

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Posted on April 16, 2021 at 1:19pm — 10 Comments

फूल काँटों में खिला है- ग़ज़ल

२१२२ २१२२ 

फूल काँटों में खिला है, 

प्यार में सब कुछ मिला है. 

 

है न कुछ परिमाप गम का, 

गाँव है, कोई जिला है. 

 

झोंपड़ी का देखकर गम,

तख़्त कब कोई हिला है. 

 …

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Posted on October 19, 2020 at 11:30am — 6 Comments

जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे - ग़ज़ल

सागर से भी गहरे देखे.

जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे.

 

नए दौर में नई सदी में,

साँसों पर भी पहरे देखे. 

 

गांधी जी के तीनों बंदर, 

अंधे गूँगे बहरे देखे.

 …

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Posted on October 14, 2020 at 12:54pm — 10 Comments

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At 2:23pm on September 28, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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