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पुस्तक समीक्षा: सुर्ख़ लाल रंग (कहानी संग्रह)

पुस्तक का नाम : सुर्ख़ लाल रंग
विधा: कहानी सँग्रह
लेखक: विनय कुमार 
प्रकाशक: अगोरा प्रकाशन 
मूल्य : 499/- रु (सज़िल्द) 160 /- (अज़िल्द)
प्रथम संस्करण: वर्ष 2022
पृष्ठ संख्या : 120 
ज़मीन से जुड़ी माटी की महक लिए हुए विनय कुमार जी की कहानियाँ
विनय कुमार जी का यह प्रथम कहानी संग्रह है जिस हेतु आप बधाई के पात्र हैं। 
सबसे पहले इसके आवरण पृष्ठ की चर्चा करना चाहूँगी। आवरण पर सुर्ख़ लाल रंग का एक गोलाकार बना हुआ है, और एक लंबे केशों वाली स्त्री जिसके हाथ में नन्ही चिड़िया है और लाल रंग का ही वस्त्र पहनी है , नीचे बने पानी में गोता लगाने के लिए तैयार है और उसके केशों को नन्हीं नन्हीं चिड़ियों ने अपना आराम करने का स्थान बना लिया है। यह काल्पनिक चित्र बेहद सुंदर बन पड़ा है। 
प्रस्तुत कहानी संग्रह की अनुक्रमाणिका की बात करें तो इसमें कुल 14 कहानियाँ प्रकाशित हुई है। 
सर्वप्रथम कहानी का शीर्षक 'सुर्ख़ लाल रंग' ही है जो कहानी संग्रह का भी शीर्षक है। 
इस कहानी में एक ऐसा गाँव का चित्रण है जिसमें एकता का माहौल था परंतु कुछ दिनों से यहाँ का वातावरण बदल गया था। लोगों के मध्य  दंगे-फसाद का भय पनपने लगा था। इस गाँव में रज्ज़ाक जोकि करघे पर काम करता था और लक्ष्मण दोनों दोस्त होते हैं । लक्ष्मण के बेटी की शादी तय होती है और वह रज्ज़ाक से उसकी शादी का जोड़ा यानी की साड़ी बनाने को कहती है। वह ख़ुशी से मान जाता है और वह इस काम की शुरूवात भी कर देता है  परंतु बीच में ही दंगे भड़क उठते हैं और गाँव खाली होने लगता है परंतु रज्ज़ाक अपना काम पूरा करके ही जाना चाहता है। कार्य जब समापन पर आता है तब पीछे से कोई उसपर वार करता है और उसके शरीर से लहू बहकर  साड़ी पर उतर आता है और  रंग सुर्ख़  लाल हो जाता है जैसा वह चाहता था। यह अंत बहुत ही मार्मिक बना है । 
दूसरी कहानी 'असली परिवर्तन' में एक बैंक प्रबंधक का संघर्ष है जिसकी पोस्टिंग दूर दराज गाँव में हो जाती है और वह न सिर्फ बैंक के हूलिये को सही करवाता है परंतु उसके व्यवसाय को बढ़ाने हेतु भी रात-दिन एक कर देता है और स्टाफ को प्रेम-भाव से ही नियमित और समय पर आने हेतु प्रेरित करता है। इसी बीच जब उसको पता चलता है कि आसपास कुछ आदिवासी बस्तियाँ भी है तब वह अपने एक सहयोगी के साथ जाकर उन ग्रामीणों से कर वसूली के लिए उनसे चर्चा करता है परंतु उनके हालातों को समक्ष  देखने के बाद वह तय कर लेता है कि अब उसको उन गरीबों को काम दिलवाने के लिये भी कार्य करना होगा। देश के विकास हेतु न सिर्फ कागज़ों पर अपितु ज़मीनी तौर पर भी कार्य करना होगा इसी उद्देश्य को सिद्ध करती है यह कहानी जो बहुत ही सहजता से लिखी गयी है और इसको पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक के साथ हम भी इन सब स्थानों और कार्यों में उनके साथ हैं। 
तीसरी कहानी 'आत्मनिर्भरता' एक सेवानिवृत विदुर पिता की कहानी है जो अपने बच्चों से पैसे नहीं माँगता । दोनों बेटे ही बारी-बारी से उनको अपने साथ रखते हैं और ध्यान से उनकी जेब में खर्च के लिये कुछ पैसे रख देते हैं। जब बड़ा बेटा ऐसा करना भूल जाता है तो छोटे बेटे के इधर उधर की बातों में पूछने से वह अपरोक्ष रूप से बोल पड़ते हैं कि वह गलती से बाहर जाते वक्त दूसरा कुर्ता पहन लेते हैं जिसकी जेब में पैसे नहीं होते सो वह चाहते हुए भी बच्चों के लिये ताज़ा मूंगफली नहीं ला पाते हैं। छोटे बेटे को पता चल जाता है और वह अपने बड़े भाई से खुलकर अपने पिता की खुद्दारी की बात करता है। बड़े बेटे को अपनी गलती का एहसास हो जाता है और वह अपनी आदत भी सुधार लेता है और पिता धीरे धीरे उनके सामने खुल जाते हैं और अब वह अपने चेक बुक पर रकम लिखना भी शुरू कर देते हैं। बुजुर्गों को घर में सहज बनाने के लिए उनको इस बात का एहसास कराना होता है कि बच्चे उनके साथ हैं और हर घड़ी उनके साथ रहेंगे। बुजुर्ग विमर्श पर यह एक सुंदर ममोवैज्ञानिक कहानी बन पड़ी है।
चौथी कहानी 'इंतज़ार' एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसको माँ के गर्भ में ही कुछ खिला दिया था पिता ने ताकि उसका जन्म ही न हो परंतु विधि के विधान ने कुछ और ही तय कर लिया था और उसका जन्म तो हुआ पर जो खिलाया गया था उसका असर उसके चेहरे पर आ गया और वह सुंदरता की श्रेणी में आने से बाहर हो गयी। पिता की इस घिनौनी हरकत का पता चलते ही वह उनसे नफ़रत करने लगती है और तय कर लेती है कि वह डॉक्टर बनेगी और वो भी प्लास्टिक सर्जरी की सर्जन। समय के साथ पिता को अपने किये पर पश्चाताप होता है और माता-पिता चाहते है कि उसकी समय पर शादी हो जाये या वह अपनी पसन्द के लड़के से विवाह कर ले परंतु उसकी सूरत से कौन प्यार कर सकता है और जो उसके साथ हुआ कहीं ऐसा ही आगे उसकी बच्ची के साथ न होजाए के भय से वह इनकार करती रहती है बाद में उनके ही घर के पास रहने वाले डॉ वर्मा जो उसके घर अक्सर आते रहते हैं के बारे में उसको जब उसकी माँ बताती है कि वह उसको पसंद करते है तो वह उनके साथ करीब के पार्क में जाकर बातचीत करती है और उनको इंतज़ार करने को कहती है। इंसान का कोई भी घाव क्यों न हो उसपर प्यार का मरहम लगाने से कभी न कभी असर दिखने लगता है और घाव ठीक हो जायेंगे की आशा जाग उठती है। यही इस कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास हुआ है। यह भी एक मनोवैज्ञानिक कहानी बन पड़ी है ।
'उदास चाँदनी' एक प्रेम कहानी है जिसमें कहानी का नायक का मिजाज कुछ हटकर है और नायिका उसको इतना प्रेम करती है कि वह नौकरी करती है और नायक को समय-समय पर पैसे भी देती रहती है। दोनों को एक दूसरे के साथ अच्छा भी लगता है। धीरे-धीरे नायिका को लगने लगता है कि उसका प्यार उसको अवॉयड कर रहा है और ऐसा वह जानबूझकर कर रहा है पर उसको स्मरण हो आता है कि इस तरह से रिश्ता निभाने की चाहत भी तो उसीने करी थी। सो जहाँ तक हो सकेगा वह आगे भी ऐसा ही करती रहेगी। बस उसको मेसेज कर देती है कि वह अगले हफ़्ते भी उसका इंतज़ार करेगी। दूसरी प्रेम कहानियों की तरह इस कहानी में भी उतार-चढ़ाव तो हैं पर हैप्पी एंडिंग जैसा कुछ नहीं है। पर इसके नायक और नायिका की सोच और उन दोनों का दुनिया को देखने और समझने का नज़रिया अलग-अलग है दोनों ही पात्रों का मनोविश्लेषण लेखक ने बहुत ही करीने से किया है और साथ ही दोनों के ममोविज्ञान को भी बहुत ही सुंदरता से प्रस्तुत किया है।
'कोई और चारा भी तो नहीं' उन किसानों पर आधारित मार्मिक कहानी है जिन्होंने मवेशियों और नीलगाय के आतंक को झेला है। ये पशु जिस तरह से आकर फ़सलो को तहस-नहस कर जाते थे, किसानों के बहुत प्रयासों के बावजूद जब कोई उपाय कारगर न हो सका तो समाज के ऐसे लोग जो इन मवेशियों को पवित्र मानकर पूजा करते थे, को उन पशुओं को मारने के लिये हत्यार उठाने पड़ गए। ह्रदय विदारक घटनाएँ जिनसे किसानों को झूझना पड़ा उनका सजीव चित्रण करके लेखक ने किसानों के जीवन के उन संघर्षों से परिचय करवाया है जिसके बारे में अखबारों में  न्यूज़ के रूप में आया, टी.वी. चैनलों ने भी दिखाया परंतु शब्दों में पिरोकर इस तरह से प्रस्तुत करना यह आपके न सिर्फ एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का सूचक है अपितु आपके इन घटनाओं को करीब से महसूस कर उनको कहानी में पिरोना आपका लेखकीय कौशल को उजागर करता है। साधुवाद के पात्र हैं विनय कुमार जी।
'चन्नर' संस्मरणात्मक शैली में लिखी इस कहानी में भारत देश का वह इतिहास है जो अंग्रेजो के जाने के उपरांत हमारे गाँव और अंचलों के लोगों से जुड़ा हुआ है। यह एक बेहद भवनात्मक कहानी है जो है तो एक गाँव के  एक दरोगा के घर काम करने वाला एक व्यक्ति 'चन्नर' की। उसके जीवन की, उसके संघर्ष की, उस पर हो रहे अत्याचार की और अंग्रेजो के बाद किस तरह से समाज में लोग जीते थे, जाति- बिरादरी, ऊँच-नीच कितना उस दौरान से वर्तमान के गाँवो और अंचल बस्ती में हो रहे परिवर्तन की फिर वो चाहे उनके रहन-सहन की हो, उनकी सोच की हो, उनके काम की हो या उनके विकास की। चन्नर एक व्यक्ति विशेष नहीं है यह समाज का एक ऐसा समुदाय है जिसने न सिर्फ शारीरिक अपितु मानसिक प्रताड़ना झेली है और लंबे अरसे तक समाज में उपेक्षित रहा है। एक कहानी में इतना कुछ समेट लेना और वो भी इतनी सहजता से ! यह कहानी उन पाठकों के लिये उत्तम साबित होगी जो अंचलों के बारे में जानते ही नहीं। उनके लिए ज़मीनी तौर पर बहुत कुछ सिखाएगी यह कहानी।
'जीत का जश्न' कोरोना की महामारी के दौरान देश के कुछ राज्यों में चुनाव था जिसके चलते गाँव से पलायन करके गए ग्रामीणों को वहाँ के प्रतिवादी नेताओं ने उनको बुलवा भेजा ताकि ये लोग चुनाव के पहले इनके लिये प्रचार-प्रसार कर सकें और इनको खाना-पीना , दारू आदि पिलाकर वोटों की राजनीति खेल सकें। गाँव से जुड़े मजदूर वर्ग हमेंशा की तरह इन लोगों के झाँसे में आ गए और कोरोना के दूसरे चरण में कईयों ने अपनी जान गंवाई और दूसरी तरफ जीत का जश्न मनाया गया। वर्तमान राजीनीति का एक बेहतरीन उदाहरण इस कहानी के माध्यम से उजागर होता है। 
'जुनैद' आत्मकथात्मक शैली में लिखी यह कहानी एक कश्मीरी लड़के जुनैद से जुड़ी है जब आपकी पोस्टिंग भोपाल में हुई थी। जुनैद से आपका परिचय एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में हुआ था और वहीं पता चला कि वह ग़ज़ल लिखता है। कुछ मुलाकातों में उन्होंने यह जाना कि वह कश्मीर से आया है और एक विद्यार्थी है। कश्मीरियों की परेशानियाँ और देश के होकर भी कटे हुए के दर्द से गुज़र रहे कश्मीरियों के दुःख-दर्द को आपने जुनैद के मुँह से सुना जो आँखे नम कर देता है। बाद में जुनैद उनको बार-बार फोन करता है मदद माँगने के लिये जिसको आप टालते है परंतु जब वह फॉर्म को भरने की बात करता है और मदद की गुहार करता है तब आप उसकी मदद करते हैं। एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति के लिये संवेदना जगाती हुई एक अच्छी कहानी है। 
'पुतले का दर्द' रेडीमेड कपड़ों की दूकान में काम करने वाले एक व्यक्ति की कहानी जो औरतों के प्रति संवेदनशील था और उनकी इज्जत करता था। फिर चाहे वह उसकी माँ हो, बहनें हो, या दूकान में रखे हुए औरतों के पुतले जिनको वह बड़े से आदरभाव से सजाता था। उसका जिस स्त्री से विवाह होता है वह भी बहुत सीधी-सरल महिला है, और इन दोनों की एक बेटी है। तीनों बहुत ही प्यार से साथ रहते हैं, नायक की पत्नी को स्तन का कैंसर है जैसे ही पता चलता है नायक उसके ईलाज में कहीं कमी नहीं छोड़ता और नौबत यहाँ तक आ जाती है कि उसके पत्नी का एक स्तन की सर्जरी करना पड़ जाती है। उसके बाद उसके चेहरे की उदासी को देखकर, उसको अपनी पत्नी की पीड़ा सहन नहीं होती और वह तय कर लेता है कि वह इसके लिये अपने डॉक्टर से बात करेगा। एक पति का अपनी पत्नी के लिये प्यार एवं उसके प्रति उसकी संवेदना और साथ ही पुतलों से भी ऐसे ही संवेदना से उनको सजाने की क्रिया पुरुषों में भी संवेदना और कोमलता के भाव होने की पुष्टि करता है। पति-पत्नी के प्रेम की एक प्यारी सी कहानी हुई है। 
'फिर चाँद ने निकलना छोड़ दिया' आरंभ से यह कहानी काल्पनिक है जिसमें धरती पर कई दिनों से रात को चाँद नहीं दिखा है, लोगों के मन में ढेरों सवाल हैं उनकी चर्चाओं में इस बात के लिए आश्चर्य के साथ चिंता भी है कि आखिर इस अनहोनी के पीछे का क्या कारण हो सकता है।  एक पंडित इन चर्चाओं में अपनी रोटी सेकने का प्रयास करता है और लोगों को इसके लिये उपाय बातायेगा कह कर उनको संतुष्ट करने का प्रयास करता है। वही तारों  के लोक में भी इसी बात को लेकर चिंता व्याप्त है। देवता इसके पीछे का कारण चाँद के साक्ष्य में धरती पर हो रहे अमानवीय व्यवहार बताते हैं जिसमें छोटी बच्चियों पर बढ़ते बलात्कार के हादसे हैं। इस बीच बारिश तो हो जाती परंतु चाँद नहीं आता। परंतु सृष्टि के लिये देव एक तारे को चाँद बना देते हैं पर वो उस असली चाँद जैसी रौशनी नहीं दे पाता क्योंकि चाँदनी सँग नही है। इसके अंत में लेखक ने एक प्रश्न पूछा है जिसका उत्तर हम सबको तलाशना है । और वो प्रश यह है,' अब आप ही बताइए , क्या आसमान पर वही पुराना चाँद देखा है जो आप कुछ महीनों पहले देखा करते थे। आप सच सच बताइएगा, अब वह नहीं दिखता है ना!'
'मुर्दा परम्पराएँ' एक छोटे किसान के दर्द की कहानी है जिसके घर में पिता की मृत्यु हो जाती है और पुरानी  परंपराओं के चलते जो खर्च उसको बताया जाता है जिससे उसको लगने लगा कि जब उसकी माँ मरी थी तब उनके खेत का आधा हिस्सा उसके बापू ने बेच दिया था और अब बापू की मृत्यु के बाद बचा कुचा खेत भी इन परंपराओं की बलि चढ़ जाएगा। एक भावनात्मक कहानी बनी है जिसमें समाज में पुरानी परंपराओं की आड़ में संवेदनहीन सोच आज भी मौजूद है। 
'यह बस होना ही था' दो दोस्तों की कहानी है और उनके बच्चों के साथ प्रेम को दर्शाती है। पिता-पुत्र का प्रेम तो स्वाभाविक होता है परंतु दोस्त के बच्चे से भी उतना ही प्रेम करना साथ ही बच्चों का भी अपने पिता के दोस्त से पिता-सा ही प्रेम करना सुखद अनुभव होता है। ऐसा ही कुछ इस कहानी के पात्रों के बीच होता है। एक दोस्त का बेटा बनारस पढ़ने जाता है जिसको मिलने अक्सर उसका अंकल ही आता है। एक बार कोचिंग जाते समय कोहरे के कारण रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो जाता है और वह कोमा में चला जाता है। जब डॉक्टर उनको सही स्थिति बता देते हैं, दोस्त उस लड़के के पिता को सांत्वना देता है और हृदय को मजबूत रखने को कहता है। बच्चे की मृत्यु हो जाती है और दोनों दोस्त उस बच्चे के अंगदान करने हेतु डॉक्टर के पास जाते हैं। यहीं इस कहानी का मार्मिक अंत है। इस कहानी के ज़रिए लेखक ने बनारस के गंगा घाट, वहाँ की गलियाँ, संस्कृति, त्यौहार इत्यादि का बेहद सुंदर एवं रोचक वर्णन किया है। 
प्रस्तुत कहानी सँग्रह की अंतिम कहानी 'सौदा' है। जो गाँव में दो अलग-अलग जाति-बिरादरी के मध्य ज़मीन को लेकर सौदे पर आधारित है। एक किसान के लिये अपने बेटी की शादी करना बहुत बड़ा सपना होता है । इसके लिये अक्सर इन लोगों को या तो कर्ज़ लेना पड़ जाता है या अपनी ज़मीन को बेचने के लिये विवश हो जाते हैं। गाँव के लोग व्यवसायिक बनकर ज़मीन को खरीद तो लेते हैं परंतु उनको इस बात से संतोष भी होता है कि आख़िर गाँव की बेटी के लिये अपरोक्ष रूप से ही सही पर वह काम तो आये। 
विनय कुमार जी सभी कहानियों में माटी की महक है, सहज और स्वाभाविक भाषा-शैली है। आपने बीच-बीच में आवश्यकता के अनुसार आँचलिक भाषाओं का प्रयोग बहुत ही करीने से किया है। आपको इस बेहतरीन सँग्रह के लिये हार्दिक बधाई एवं भविष्य के लिये शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ।
अप्रकाशित, अप्रसारित ।

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बहुत बहुत धन्यवाद आ कल्पना भट्ट जी, जिस तरह से आपने इस पुस्तक की बृहद और सारगर्भित समीक्षा की है उसके लिए मैं आभारी हूँ

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