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परछाईयाँ (२ क्षणिकाएं ) ....

परछाईयाँ (२ क्षणिकाएं ) ....

1.

एक अंत
मृतिका पात्र में
कैद हो गया
जीवन के धुंधलके में
अर्थहीन परछाईयों का
पीछा करते करते

..............................

2.

बीते कल की
क्षत-विक्षत अभीप्सा का
शृंगार व्यर्थ है
अन्धकार को भेदो
सूरज वहीं कहीं मिलेगा
दुबका हुआ
नई अभीप्सा का

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 740

Comment

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Comment by narendrasinh chauhan on July 31, 2018 at 10:00pm
खुब सुन्दर रचना
Comment by Sushil Sarna on July 30, 2018 at 3:55pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on July 30, 2018 at 3:55pm

आदरणीय  TEJ VEER SINGH जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 29, 2018 at 2:15pm

वाह आदरणीय सुन्दर क्षणिकाएं..बधाई

Comment by TEJ VEER SINGH on July 26, 2018 at 8:44pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी। बेहतरीन क्षणिकायें।

Comment by Sushil Sarna on July 26, 2018 at 6:29pm

आदरणीय श्याम नारायण जी सृजन आपकी मधुर प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on July 26, 2018 at 6:29pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by Shyam Narain Verma on July 25, 2018 at 2:53pm
सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें
Comment by Samar kabeer on July 25, 2018 at 11:49am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा क्षणिकाएँ हुई हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on July 24, 2018 at 7:47pm

आदरणीया  babitagupta जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

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