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1222 1222 1222 1222


छुपी हो लाख पर्दों में मुहब्बत देख लेते हैं ।
किसी चहरे पे हम ठहरी नज़ाकत देख लेते हैं ।। 1

.

तेरी आवारगी की हर तरफ चर्चा ही चर्चा है ।
यहां तो लोग तेरी हर हिमाक़त देख लेते हैं ।। 2

.

चले आना कभी दर पे अभी तो मौत बाकी है ।
तेरे जुल्मो सितम से हम कयामत देख लेते हैं ।।3

.

बड़ी मदहोश नजरों से इशारा हो गया उनका ।
दिखा वो तिश्नगी अपनी लियाकत देख लेते हैं ।। 4

.

खबर तुझको नहीं शायद तेरी उल्फत में हम अक्सर ।
जमाने भर के लोगों की हिदायत देख लेते हैं ।।5

.

मेरे अहसास का अंदाज तुझको है कहाँ साकी ।
अगर तू है तो ये दुनियाँ सलामत देख लेते हैं ।।6

.

परेशां हो के गुजरे हैं इसी कूचे से हम भी जब।
तुम्हारी मुस्कुराहट में किफ़ायत देख लेते हैं ।।7

.

गज़ब अंदाज़ है उनका गज़ब दरिया दिली उनकी ।
रियाया के लिए वो भी रियायत देख लेते हैं ।।8

.

झटक के जुल्फ वो चलते अदाएं हैं बड़ी क़ातिल ।
हम उनकी आँख की अक्सर शरारत देख लेते हैं ।।9

.

हसीनों से सँभल कर तो यहाँ चलना है मजबूरी।
यहाँ मासूमियत में हम सियासत देख लेते हैं ।।10

.

बहुत बेचैन दिखते हैं ये दीवाने चमन में जब ।
तुम्हारे हुस्न में होती इज़ाफ़त देख लेते हैं ।। 11

.

मौलिक अप्रकाशित

--नवीन मणि त्रिपाठी

Views: 475

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 29, 2018 at 8:47pm

अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय त्रिपाठी जी..

Comment by TEJ VEER SINGH on March 29, 2018 at 11:12am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन जी। बेहतरीन गज़ल।

मेरे अहसास का अंदाज तुझको है कहाँ साकी ।
अगर तू है तो ये दुनियाँ सलामत देख लेते हैं ।।6

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 28, 2018 at 10:04pm

आ0 कबीर सर सादर नमन के साथ हार्दिक आभार ।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 10:02pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

8वें शैर के सानी मिसरे में,'रियाया' ग़लत है,सही शब्द है "रिआया" ,इसी तरह 'रियायत' ग़लत है,सही शब्द है "रिआयत" देखियेगा ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 28, 2018 at 8:41pm

आ0 मुहम्मद आरिफ़ साहब हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 28, 2018 at 8:40pm

भाई सुरेंद्र इंसान जी सप्रेम नमन । आपको ओबीओ में देख कर बहुत खुशी हुई । आ0 समर कबीर साहब के निर्देशन में लिखने की कोशिश करता रहता हूँ । अभी तो बहुत कुछ सीखना बाकी है । रचना तक आने के लिए एक बार पुनः धन्यवाद ।

Comment by surender insan on March 28, 2018 at 7:23pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी सादर नमन। ग़ज़ल का बेहतरीन प्रयास हुआ है ।दिली दाद कबूल करे जी।

Comment by Mohammed Arif on March 28, 2018 at 5:36pm

मेरे अहसास का अंदाज तुझको है कहाँ साकी ।
अगर तू है तो ये दुनियाँ सलामत देख लेते हैं । वाह!वाह!!  बहुत.ही उम्दा शे'र लगा ।

              एक शानदार ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी ।

             कुछ वर्तनी पर ध्यान दिलाना चाहूँगा जैसे:- बाकी/बाक़ी , जुल्मो/ज़ुल्मों , कयामत/क़यामत ,खबर/ख़बर , जमाने/ज़माने , अंदाज/अंदाज़ , नजरों/नज़रों, गुजरे/गज़रे , मजबूरी/मज़बूरी आदि ।

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