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ग़ज़ल - झूठ का इश्तहार खूब चला

बह्र - फाइलातुन मफाइलुन फैलुन

झूठ का इश्तहार खूब चला।
इस तरह कारोबार खूब चला।

कोने कोने में मुल्क के साहब,
आप का ऐतबार खूब चला।

गाँव तो गाँव हैं नगर में भी,
रात भर अंधकार खूब चला।

जो हक़ीक़त से दूर था काफी,
वो भी तो बार बार खूब चला।

नोट में दाग थे बहुत लेकिन,
नोट वो दाग़दार खूब चला।

सबने देखा है किस अदा के साथ,
बेवफा तेरा प्यार खूब चला।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 27, 2017 at 10:25pm

आदर्णीय समर कबीर साहब सादर आभार उत्साह वर्धन करने के लिये।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 27, 2017 at 10:23pm

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल सराहना के लिये।

Comment by Samar kabeer on December 27, 2017 at 10:06pm

जनाब राम अवध जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 27, 2017 at 8:40pm

वाह वाह बहुतखूब ग़ज़ल हुई आदरणीय..सादर

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 27, 2017 at 2:34pm

आदर्णीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी ग़ज़ल सराहना के लिये आपका शुक्रिया। कारोबार में 'रो' का वज़्न गिराया जाने के कारण 2121 हो गया है।

Comment by नाथ सोनांचली on December 27, 2017 at 2:19pm

आद0 रामअवध जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई कुबूल करें।

एक जिज्ञासा थी, कारोबार का वजन क्या लिया आपने। 

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 27, 2017 at 11:49am

आदर्णीय अजय तिवारी जी आप की टिप्पणी मुझे उर्जा प्रदान करती है। बहुत बहुत धन्यवाद। सादर

Comment by Ajay Tiwari on December 27, 2017 at 11:23am

सामयिक परिदृश्य पर पर प्रभावशाली व्यंग! 

आदरणीय राम अवध जी, उम्दा ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई. सादर.   

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 27, 2017 at 8:23am

आदर्णीय आरिफ साहब हौसला बढ़ाने  एवं ग़ज़ल सराहना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Mohammed Arif on December 27, 2017 at 8:20am

आदरणीय राम अवध जी आदाब,

                       शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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