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जश्न मिल जुल कर मनाओ यौमे आज़ादी है आज - ग़ज़ल

आग नफरत की बुझाओ यौमे आज़ादी है आज
दिल से दिल अपने मिलाओ यौमे आज़ादी है आज

मंदिरों मस्जिद के झगड़े छोड़ कर ऐ दोस्तों
बात कुछ आगे बढ़ाओ यौमे आज़ादी है आज

जो हक़ीक़त थी वो सब इतिहास बन कर रह गई
याद शोहदा की दिलाओ यौमे आज़ादी है आज

जान जब क़ुर्बान करते हो वतन के वास्ते
तो तिरंगा भी उठाओ यौमे आज़ादी है आज

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई के झगड़े भूल कर
"जश्न मिल जुल कर मनाओ यौमे आज़ादी है आज"

हमने छत दीवारो दर अपने सजायें हैं सभी
तुम भी घर अपने सजाओ यौमे आज़ादी है आज

ये भी आज़ादी है या सहरा का मंज़र दोस्तों
मुल्क को गुलशन बनाओ यौमे आज़ादी है आज

देश की ख़ातिर रहो सीना सिपर 'रिज़वान' तुम
खौफ दुश्मन से न खाओ यौमे आज़ादी है आज

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on September 21, 2017 at 11:18pm
आप सभी हज़रात तहे दिल से शुक्रिया
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 17, 2017 at 11:20am
बहुत खूब.....हार्दिक बधाई, रिजवान भाई।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 16, 2017 at 12:51pm
बड़ी अच्छी देशभक्ति से परिपूर्ण ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय..
Comment by Mohammed Arif on August 15, 2017 at 8:06pm
आदरणीय मोहम्मद रिज़वान जी आदाब, जश्ने आज़ादी के मौके पर बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल ।मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बातों का संज्ञान लें ।
Comment by Samar kabeer on August 14, 2017 at 10:24pm
जनाब रिज़वान साहिब आदाब,यौम-ए-आज़ादी पर उम्दा ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई के झगड़े भूल कर'
इस मिसरे में लय बाधित हो रही है,इसे यूँ कर सकते हैं :-
"हिन्दू,मुस्लिम,सिख्ख,ईसाई के झगड़े भूल कर"
Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 14, 2017 at 5:18pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय MOHD.RIZWAN जी 

Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on August 14, 2017 at 3:26pm
आ० रवि शुक्ला जी हौसला अफज़ाई का आपका तहे दिल से शुक्रिय!
Comment by Ravi Shukla on August 14, 2017 at 2:59pm

आदरणीय रिजवान जी बहुत अच्‍छी और प्रासंगिक गजल कही आपने इस सुंदर गजल के लिये बधाई पेश है ।

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