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ग़ज़ल - तड़प रहा हूँ मगर मुस्कुरा रहा है कोई

तड़प रहा हूँ मगर मुस्कुरा रहा है कोई
सितम पे और सितम आज ढा रहा है कोई

अदाओं नाज़ से दामन बचा रहा है कोई
की आज मुझसे निगाहें चुरा रहा है कोई

सहूंगा कैसे मैं ग़म अर्स-)ए जुदाई का
बिछड़ के मुझसे बहुत दूर जा रहा है कोई

हवाएं बुग्जो अदावत की लाख तेज़ सही
मग़र चराग़ वफ़ा के जला रहा है कोई

कमा के नेकियाँ फिर आज आखरत के लिए
नये मकान का नक्शा बना रहा है कोई

वफ़ा ही करता रहा आज तक मगर "रिज़वान"
नज़र से अपनी मुझे क्यूँ गिरा रहा है कोई

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 2, 2016 at 5:48pm

कमा के नेकियाँ फिर आज आखरत के लिए
नये मकान का नक्शा बना रहा है कोई

बहुत खूब | आदरणीय रिजवान जी बधाई कुबूल करें |

Comment by kanta roy on June 1, 2016 at 9:22pm
तड़प रहा हूँ मगर मुस्कुरा रहा है कोई
सितम पे और सितम आज ढा रहा है कोई----क्या खूब गजल कही है आपने आदरणीय रिजवान जी । बहुत बहुत बधाई आपको ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 29, 2016 at 8:48pm

कमा के नेकियाँ फिर आज आखरत के लिए
नये मकान का नक्शा बना रहा है कोई.....ये उम्दा शेर हुआ है ..जैसे उपर से उतरा हुआ..बधाई आप को 

Comment by Samar kabeer on May 29, 2016 at 6:38pm
जनाब रिज़वान साहिब आदाब,ग़ज़ल के अरकान लिखना मंच का नियम है, उसका पालन करें ।
ग़ज़ल अच्छी कही आपने दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
मतले का ऊला मिसरा साफ़ नहीं है, इस तरह लिखेंगे तो बात साफ़ हो जायेगी:-
"मिरे तड़पने पे क्यों मुस्कुरा रहा है कोई"
तीसरे शैर का ऊला मिसरा बह्र से ख़ारिज हो रहा है, देखिएगा ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 29, 2016 at 1:31pm

बहुत ही खूब.....बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 29, 2016 at 9:03am

आदरणीय रिज़वान भाई , सबसे पहले तो ये निवेदन है कि , ग़ज़ल के ऊपर बह्र का उल्लेख ज़रूर किया कीजिये , यहाँ सभी एक दूसरे से सीखते हैं , बह्र निकाल पाना सभी के लिये सरल नही है ।

आदरणीय , गज़ल बहुत अच्छी कही है , मुबारक बाद कुबूल कीजिये ।
सहूंगा कैसे मैं ग़म अर्से जुदाई का   -- इस मिसरे की तक्तीअ कर के एक बार और देखियेगा ।

हवाएं बुग्जो अदावत की लाख तेज़ सही
मग़र चराग़ वफ़ा के जला रहा है कोई   --- बहुत खूब !

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