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ग़ज़ल नूर की - हैरान क्या करेगा कोई मोजज़ा मुझे

२२१/ २१२१/ १२२१/ २१२

हैरान क्या करेगा कोई मोजज़ा मुझे,
दुनिया का हर तमाशा लगे ख़्वाब सा मुझे.
.
हालाँकि ख़ुशबू इल्म-ओ-अदब की नहीं हूँ मैं,
लेकिन बिख़रने का है बहुत तज़रिबा मुझे.
.
इक रोज़ मैं ही तेरे किसी काम आऊँगा,
गरचे तू मानता ही नहीं काम का मुझे.
.
तेरे कहे पे चल पड़ा हूँ आँखें मूँदकर
ठोकर लगे तो मौला मेरे थामना मुझे.
.
ये कौन मेरे हिज्र को करता है और तवील,
जीने की फिर ये कौन दुआ दे गया मुझे.
.
आकर मिज़ाज-पुरसी किया कर मेरी कभी
तुझ से ख़फ़ा हूँ ज़िन्दगी, समझा बुझा मुझे.
.
पूँजी हूँ उम्र भर की तो मुझ को सँजो के रख
खैरात लग रहा हूँ तो सब पर लुटा मुझे.
.
तुम रहनुमाओं वाले हो तुम क़ाफ़िला बनों
मंज़िल दिखा रही है सही रास्ता मुझे.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1270

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Comment by नाथ सोनांचली on August 4, 2017 at 4:55am
आद0 नीलेश जी सादर अभिवादन, बहुत उम्दा ग़ज़ल कही आपने, हम सीखने वालो को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। बधाई दाद के साथ आपको। सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 3, 2017 at 6:40pm
आदरणीय नीलेश भाई मोजिज़ा का जो जिक्र आदरणीय समर सर ने किया है उसके बारे में जानकारी साझा करने का कष्ट करें सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 3, 2017 at 6:38pm
आदरणीय नीलेश भाई दिल को छू लेने वाली शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई ये कौन मेरे हिज्र को करता है और तबील इसमें मात्राओ मेंऔर तबील पर थोडा असमंजस में हूँ शंका के समाधान हेतु निवेदन के साथ
Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 3, 2017 at 11:40am
शुक्रिया आ संतोष दादा
Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 3, 2017 at 11:37am
शुक्रिया आ समर सर।
आपकी बात पर विचार कर रहा हूँ। कुछ बनते ही तरमीम कर लूँगा
सादर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 3, 2017 at 11:36am
शुक्रिया आ मोहम्मद आरिफ साहब
Comment by santosh khirwadkar on August 2, 2017 at 8:07pm

वहहहह खूब !!

Comment by Samar kabeer on August 2, 2017 at 3:35pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'हैरान क्या करेगा कोई मोजज़ा मुझे'
"मौजिज़ा"-आप ने अपनी ज़िन्दगी में कितने मौजिज़े देखे हैं भाई ?इतिहास साक्षी है कि सदियों से कोई मौजिज़ा नहीं हुआ,26 फ़रवरी को जब हम भोपाल में जनाब तिलक राज कपूर साहिब के यहाँ मिले थे वहाँ मैंने कपूर साहिब को "मौजिज़ा"शब्द के बारे में विस्तार से बताया था,उम्मीद है आपको याद होगा,मतले के इस मिसरे में इसे बदलने की ज़रूरत है ।
Comment by Mohammed Arif on August 2, 2017 at 2:40pm
हैरान क्या करेगा कोई मोजज़ा मुझे, वाह!वाह!! क्या ख़ूब ग़ज़ल का मतला कहा है । हर ख़्वाब अब तमाशा ही तो रह गया है ।

दुनिया का हर तमाशा लगे ख़्वाब सा मुझे.
शे'र धर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आदरणीय नीलेश जी ।
.

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