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किसी मरते को जीने का वहाँ अधिकार हो जाए(तरही गजल)

1222 1222 1222 1222
किसी मरते को जीने का वहाँ अधिकार हो जाए
अगर सहरा में पानी का ज़रा दीदार हो जाए

ये गिरना भी सबक कोई सँभलने के लिए होगा
मिलेगी कामयाबी हौंसला हर बार हो जाए

वफ़ा करके नहीं मिलती वफ़ा सबको यहाँ यारो
किसी की जीत उल्फत में,किसी की हार जाए

कि खुलकर आज कह डालो दबी है बात जो दिल में
*बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए*

खमोशी को हमेशा ही समझते हो क्यों कमजोरी?
यही गर्दिश में इंसाँ का बड़ा औज़ार हो जाए

सितमगर सोच कर करना सितम तू और लोगों पर
यही तेरी ख़ता उनका कहीं हथियार हो जाए

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on May 23, 2017 at 7:49pm

आदरणीय सतविन्द्र भाई , खूबसूरत गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by narendrasinh chauhan on May 22, 2017 at 6:26pm

खूब सुरत रचना 

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 22, 2017 at 2:52pm

खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय सतविन्दर जी 

Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 2:37pm
जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले और शिल्प पर निलेश जी की बात पर ध्यान दें ।
Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 1:04pm
आदरणीय सतविंद्र जी आदाब, अच्छा प्रयास । बधाई स्वीकार करें । आदरणीय नीलेश जी की बातों पर ग़ौर करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on May 22, 2017 at 12:37pm
आद0 भाई सतविंदर जी सादर अभिवादन, इस उम्दा तरही ग़ज़ल पर शैर दर शैर मुबारकबाद कबूल फरमायें।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2017 at 10:39am

अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. सतविन्द्र जी...
सहरा में पानी का दीदार अक्सर होता है जो बहुदा मारीचिका होता है.. अत: सिर्फ दीदार जीने की गारंटी नहीं है ..और फिर मृत्यु भी शाश्वत है ... पानी नहीं तो किसी अन्य कारण से भी हो सकती है ....
मतला अगर हो सके तो किसी और  तरह कहने का प्रयास करें ...
भाव बहुत उम्दा हैं... अब आपसे और अधिक कसावट वाले शिल्प की अपेक्षा है ..
सादर  

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