For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा.................(डॉ० प्राची सिंह)

बादलों की ओट से उधार लूँ ज़रा
चाँद आज तुझको मैं निहार लूँ ज़रा..

कँपकँपा रहे अधर नयन मुँदे मुँदे
साँस की छुअन से ही पुकार लूँ ज़रा..

शब्द शून्य सी फिज़ा हुई है पुरअसर 
सिहरनों से रूह को सँवार लूँ ज़रा..

चाँद भी पिघल के कह रहा मचल मचल 
चाँदनी में प्यार का निखार लूँ ज़रा..

अब महक उठे बहक उठे प्रणय के पल
इन पलों में ज़िन्दगी गुज़ार लूँ ज़रा..

वक्त रुक! न धड़कनों सा तेज़ तू मचल
ख्वाब एक यकीन में उतार लूँ ज़रा..

झूठ है, तो क्या हुआ? है ज़िन्दगी मगर
मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा.

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 1303

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Samar kabeer on September 28, 2015 at 11:36pm
मोहतरमा प्राची सिंह जी,आदाब,आपने ग़ज़ल के अरकान नहीं लिखे ,फिर भी आपकी ग़ज़ल दिल को मोह रही है,सुन्दर ख़यालात से सजी इस ग़ज़ल के लिये दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 28, 2015 at 7:11pm

ग़ज़ल पर आप सबकी प्रोत्साहित करती प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद आदरणीय डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी , धर्मेन्द्र कुमार जी, नीरज कुमार जी , रवि शुक्ला जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 28, 2015 at 7:09pm

धन्यवाद जयनित वर्मा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 28, 2015 at 7:08pm

शेर दर शेर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आ० पंकज मिश्रा जी 

Comment by Ravi Shukla on September 28, 2015 at 1:45pm

आदरणीया प्राची जी सुन्‍दर भाव पूर्ण रचना । ग़ज़ल के पंखो के साथ कोमल भावों की सरस उड़ान । बधाई ।

Comment by Neeraj Neer on September 28, 2015 at 12:24pm

बहुत ही कोमल भावों के साथ सौंदर्य बोध में पकी सुंदर रचना ... 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 28, 2015 at 11:34am

अच्छे अश’आर हुए हैं आ. प्राची जी, दाद कुबूलें

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 28, 2015 at 10:08am

आ० प्राची जी

आपकी यह्  गजल मेरे लिए पहली है . बहुत ही सुकोमल भावों से सजी  बह्र पर भी खरी दिखती है  आपको इस रचना पर मेरी बधाई .

Comment by जयनित कुमार मेहता on September 27, 2015 at 10:49pm
आदरणीय प्राची जी, बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है..
हिंदी और उर्दू का बराबर मात्रा में मिश्रण रोचक लगा,..कृपया बधाई स्वीकार करें!!
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 27, 2015 at 10:04pm
बादलों की ओट से उधार लूँ ज़रा
चाँद आज तुझको मैं निहार लूँ ज़रा.. बहुत खूब।।

कँपकँपा रहे अधर नयन मुँदे मुँदे
साँस की छुअन से ही पुकार लूँ ज़रा..सजीव चित्रण

शब्द शून्य सी फिज़ा हुई है पुरअसर
सिहरनों से रूह को सँवार लूँ ज़रा..यहाँ तो आपनें प्रेम की परम अनुभूति प्रस्तुत कर दी।

चाँद भी पिघल के कह रहा मचल मचल
चाँदनी में प्यार का निखार लूँ ज़रा.. को निखार लूँ ज़रा

अब महक उठे बहक उठे प्रणय के पल
इन पलों में ज़िन्दगी गुज़ार लूँ ज़रा..हार्दिक अभिव्यक्ति

वक्त रुक! न धड़कनों सा तेज़ तू मचल
ख्वाब एक यकीन में उतार लूँ ज़रा..बढ़िया भाव

झूठ है, तो क्या हुआ? है ज़िन्दगी मगर
मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा...कल्पना में सत्यानुभूति।।

एक बढ़िया भावप्रवण ग़ज़ल के लिए बधाई।।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
20 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
21 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Mar 31

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service