For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बार बार नुमाईश हुई
पर खरीदारों को सामान पसंद नहीं आया
सामान को काट छाँट कर दिखाया
सजा कर सँवारकर दिखाया
पर.......
फिर भी किसी खरीदार को सामान पसंद नहीं आया
बात कुछ और थी
बाजार सामान के साथ उपहार वाला बन गया है
उपहार भी दिये गए
पर खरीदारों की ज़रूरत पूरी नहीं हुई
सामान नोंचा कुचला गया
निचोड़ा गया और जलाया मिटा दिया गया
और फिर
एक खुदगर्ज ने कवि बनने की चाह में
एक मासूम लड़की को सामान कह दिया
'अहसास'



मौलिक और अप्रकाशित

Views: 587

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by मनोज अहसास on May 6, 2015 at 2:29pm
सभी गुणी ज्ञानी लोगो ने बहुत मन से साथ दिया
आभार
कविता व्याख्या की मोहताज़ हो गयी इसमें मेरा दोष निश्चित हो गया
कभी रूप के कारण
कभी धन के कारण
कभी उच्च निम्न के कारण
जब लड़की के विवाह की समस्या नहीं सुलझती
तब सजाना
सवारना
प्रस्तुतिकरण के नए ढंग
और आखिर में खूब सारा ढेर धन का
बाजार की तरह
जो खरीदारी में योजना चाहता है
फिर प्रताड़ना
शोषण
और जीवन की मुश्किल
कभी कभी समाप्ति
और इसके बाद समाज की पीड़ा को समझने वाला साहित्यकार जब उसमे तथा ऎसे दूसरे विषय मअपने लिए सफलता की संभावना ढूढ़ता है और भावतमक शोषण करता है
फिर ग्लानि को प्राप्त करता है
दुखी होता है




और क्या लिखू
मंच की ज़िमेदार आवाजो की भूमिका का मुझे पुनः इंतज़ार है
कविता को कविता ही रहने देता पर ऎसे ही लिख दिया
क्षमा चाहता हूँ
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 6, 2015 at 9:50am

अश्लीलता आज के दौर में सफलता का पर्याय बन गयी है,हर तरफ इसी का बोलबाला दिखता है,गायक,कवि,टीवी प्रोग्राम,फ़िल्में.गीतकार,गजलकार,सभी सिर्फ पैसे और सोहरत के लिए फूहड़ता के किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है....आपने रचना में बहुत ही ज्वलंत मुद्दा उठाया है, आपको मेरी ओर से हार्दिक बधाई!

आ० मिथिलेश सर का इशारा जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ के..इस ओर है के..रचना के माध्यम से मूलतः जो आप कहना चाह रहे है'

//एक खुदगर्ज ने कवि बनने की चाह में
एक मासूम लड़की को सामान कह दिया//

वह बाकि के संवाद से ठीक तरह से जुड़ नही पा रहा है!!

जैसे काट-छांट,समान के साथ उपहार,खरीदार की जरुरत,और नोचना जलाना कुचलना आदि किस तरह से लेखक के लड़की के सामान कहने से जुड़ रहा है?? आपसी तुक बैठ नही रहा!

आशा है मै अपनी  बात कह पाया हूँ!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 5, 2015 at 9:44am

सार्थ प्रस्तुति आदरणीय मनोज जी. आपका नीचे प्रतिउत्तर पढ़कर आपकी रचना का पूर्ण आंकलन कर पाया हूँ. बहुत-बहुत बधाई प्रस्तुति पर,

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 5, 2015 at 7:44am

गहरी चोट समाज की सोच पर लगाते हुए प्रभावी अभिव्यक्ती ....सादर 

Comment by Samar kabeer on May 4, 2015 at 11:50pm
जनाब मनोज कुमार अहसास जी,आदाब,अच्छा लिखते हैं आप,बधाई स्वीकार करें |
Comment by Neeraj Neer on May 4, 2015 at 10:45pm

वाह बहुत सुंदर.... 

Comment by मनोज अहसास on May 4, 2015 at 10:25pm
आदरणीय Dr.Vijai shanker जी नमस्कार आपको प्रणाम करता हूं
सादर धन्यवाद
Comment by मनोज अहसास on May 4, 2015 at 10:14pm
नमस्कार सर आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत उपयोगी है
भाव मेरे वश में नहीं है
शिल्प का मुझे ज्ञान नहीं है
शब्द अपनी सीमा अनुसार मैंने लिख दिए है
औचित्य और आवश्यकता बहुत बड़े विषय है उनका विचार मै आप जैसे गुणी ज्ञानी जनो पर छोड़ देता हूँ
सामाजिक कुरीतियो की गहराई और कवि का उसमे स्वयं का यश ढूढ़ना.....भाव मन में न होते हुए भी सामाजिक संवेदनशील विषयो पर केवल प्रसिद्ध होने की चाह में कविता लिखना......और कभी किसी को इस कर्म से ग्लानि होजाने पर स्वीकार करने का भाव....ये सब मुझ से ये पंक्तिया लिखवा गया
........नया और अनुभवहीन होने के नाते आप क्षमा तो मुझे कर ही सकते है
सादर निवेदन
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 4, 2015 at 10:05pm
सारगर्भित प्रस्तुति, सामान के साथ ( फ्री ) क्या है, सारा अर्थ तो उसी में सिमटा है,
बधाई, आदरणीय मनोज कुमार एहसास जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 4, 2015 at 8:48pm
आदरणीय मनोज भाई जी
आपकी इस रचना के औचित्य पर विचार कर रहा हूँ और इसकी आवश्यता पर भी। भाव शब्द और शिल्प किसी भी स्तर पर इस रचना से संतुष्ट नहीं हो सका। शायद आप मुझे स्पष्ट कर सके। सादर।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
Sunday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Saturday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Jan 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service