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दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस

बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।
कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।

घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज ।
जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।।

जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग ।
घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।।

बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम ।
छोटे आते जाल में, बड़े रहें गुमनाम ।।

बाँछें खिलतीं मेज पर, जब भी  आता काम ।
बाबू भरता घूस से, अपने घर गोदाम ।।

खुलेआम अब घूस का, होता है व्यापार ।
कैसी भी हो काम की, अड़चन काटे धार ।।

लग जाए जो घूस का, चस्का मुँह को यार ।
सपने में भी घूस फिर, उसे दिखे हर बार ।।

सुशील सरना / 18-2-26
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by आशीष यादव on Monday

आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार। 

बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं। 

हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by Sushil Sarna on March 10, 2026 at 1:01pm

आदरणीय  अखिलेश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । सहमत एवं संशोधित 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 10, 2026 at 10:57am

आदरणीय सुशीलजी

हार्दिक बधाई। लगातार बढ़िया दोहा सप्तक लिख रहें हैं। घूस खोरी ....... यह  रोग  भारतीय समाज में खूब फैल गया  है।

जब कोई आता काम ।............ जब भी आता काम ।

Comment by Sushil Sarna on March 4, 2026 at 1:45pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव की हार्दिक बधाई और हार्दिक शुभकामनाऐं 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2026 at 11:00am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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