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देखते ही देखते देखो समां क्या हो गया
आज अपना आप ही खुद से पराया हो गया

देखकर बदहाली उसकी उठता नहीं अब दिल में दर्द
वो मेरी दुनिया का मालिक था जो दुनिया हो गया

मैंने उसके हिस्से की तन्हाइयां जब मांग ली
वो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा तनहा हो गया

भूलने की कोशिशों में याद रखने की तलब
दो उलट लहरो में फंसकर पाट गहरा हो गया

उसके हाथो की लकीरो में न मेरा नाम था
और जो कुछ भी लिखा था वो भी धुंधला हो गया

रह गयी है पास मेरे दर्द की परछाईया
उसको खोकर जिसको पाया वो उसी का हो गया

मैंने उसकी बेबसी से अपने मिसरे रंग लिए
बस इतनी हिम्मत से मैं भी इश्क़ वाला हो गया

अहसास ये आँखे तो बस देखती ही रह गयी
ज़ीस्त का हर एक मंज़र बद से बदतर हो गया




मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on May 8, 2015 at 2:33pm

बहुत मेहरबानी सर
आदरणीय सौरभ पांडेय जी
आपने मुझे एक और राह दिखाई है ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 11:36pm

इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाइयाँ मनोज भाई..  विश्वास है, आपको भान हो चुका होगा कौन-कौन से मिसरे बहके हैं. आप अपनी गज़लों के मिसरों का वज़न दे दिया करें. इससे आप ही को लाभ होगा. आपकी इस गज़ल का वज़न २१२२ २१२२ २१२२ २१२ है.

शुभेच्छाएँ

Comment by मनोज अहसास on May 7, 2015 at 4:51pm
शुक्रिया डॉ साहब
सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 7, 2015 at 4:47pm

मनोज जी इस सुंदर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई ..बिद्वत जन सुझाव दे ही चुके हैं  सादर 

Comment by मनोज अहसास on May 6, 2015 at 9:15pm
आप सभी ने साथ दिया
बहुत मेहरबानी
मै कोशिश करूगा कि कुछ सुधार हो जाए

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 6, 2015 at 8:38pm

आदरणीय , गज़ल अच्छी हुई है , आपको हार्दिक बधाई । 

एक दो मिसरे बे बहर  लग रहे हैं , 

देखकर बदहाली उसकी उठता नहीं अब दिल में दर्द 

अहसास ये आँखे तो बस देखती ही रह गयी       -- दोनो की तक्तीअ कर के देख लीजियेगा ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 6, 2015 at 7:46pm
बहुत खूब, प्रसंशनीय , बधाई, आदरणीय मनोज कुमार एहसास जी , सादर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2015 at 5:53pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है 
देखते देखते के बाद फिर देखो थोडा अटपटा लग रहा है 
देखकर बदहाली उसकी उठता नहीं अब दिल में दर्द..  में बहर टूट गयी है 
कुल मिलकर बहुत अच्छा प्रयास है .
बधाई आपको 

Comment by jyotsna Kapil on May 6, 2015 at 5:52pm
वाह.....लाजवाब पंक्तियाँ।एक-2 शब्द दिल को छूता चला गया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 5:47pm

वाह वाह मनोज जी बहुत खूब .... बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाए 

इस शेर पर दिल से दाद हाज़िर है -

मैंने उसके हिस्से की तन्हाइयां जब मांग ली
वो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा तनहा हो गया

आखिरी शेर में मिसरा-ए-उला पर एक बार और गौर कीजियेगा. 

सादर 

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