For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सैलाब

मानव-प्रसंगों के गहरे कठिन फ़लसफ़े

अब न कोई सवाल

न जवाब

कहीं कुछ नहीं

"कुछ नहीं" की अजीब

यह मौन मनोदशा

अपार सर दर्द

ठोस, पत्थर के टुकड़े-सा

हृदय-सम्बन्ध सतही न होंगे, सत्य ही होंगे

वरना वीरान अन्तस्तल-गुहा में

दिन-प्रतिदिन पल-पल पल छिन

गहन-गम्भीर घावों से न रिसते रहते

दलदली ज़िन्दगी के अकुलाते

अर्थ अनर्थ

कुछ हुआ कि झपकते ही पलक

विश्व-दृश्य सारा अचानक बदल गया

ज़िन्दगी का घड़ा उस अमुक पल में

धड़ाम

हाथ से छूटा

आस्था का अस्थि-पंजर फूट गया

कोई नहीं है, किसे पुकारूँ...

किससे कहूँ ... क्या करूँ ... ?

नपुंसक हुए तथ्यों की, आत्मज सत्यों की

नव-विधवा-सी स्थिति

न कोई सवाल

न जवाब

भयावनी चीखें

और कुछ नहीं

     

 - विजय निकोर

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 695

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by vijay nikore on May 27, 2015 at 4:05am

आदरणीय सौरभ भाई जी, 

आपसे मिली प्रतिक्रिया का सदैव इन्तज़ार रहता है... आपकी "सच्चाई" अच्छी लगती है।

हार्दिक धन्यवाद। सादर।

Comment by vijay nikore on May 27, 2015 at 4:02am

//आस्था का अस्थि-पंजर फूट गया... बहुत प्रभावी रचना हुई है//

मनोबल बढ़ाने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मोहन सेठी जी

Comment by vijay nikore on May 27, 2015 at 4:00am

 //एक अदृश्य दर्द ली हुई, पंक्तियाँ. भाव अंतर को भेद देते है//

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय जितेन्द्र जी।

मनोबल बढ़ाए रखें। सादर।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 1, 2015 at 12:13pm

-आदरणीय निकोर जी / पूज्य अग्रज

आपने भले ही शीर्षक सैलाब लिखा है  और सच भी है . मई इस कविता को आगत भूकंप की त्रासदी से जोड़कर देखता हूँ तो हर अक्षर के अर्थ खुलते जाते है . भूकंप के बाद भयावह वर्षा हुयी थी तो सैलाब कहना भी सार्थक है  i यह कवित़ा  इतने पर ही समाप्त नहीं होती I  मेटाफर के रूप में यह जीवन -सन्दर्भों पर भी लागू होती है जीवन में कितने सैलाब आते है कितनी इच्छायें  मरती है i बहुत ही मर्मस्पर्शी  कवित़ा  i बागी जी ने सही कहा -आपकी कुछेक अच्छी रचनाओं में सहज ही यह कविता शामिल होगी i सादर .

Comment by Samar kabeer on May 1, 2015 at 10:57am
जनाब विजय निकोरे जी,आदाब, सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 28, 2015 at 11:55pm

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , सैलाब के आमने मनुष्य की नीरीह  स्थिति का बहुत मार्मिक चित्रण हुआ है , हार्दिक बधाइयाँ । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 28, 2015 at 11:28pm

कविता देर तक वैचारिकता के समुन्द्र में डूबने उतराने पर मजबूर करती रही, आपकी कुछेक अच्छी रचनाओं में सहज ही यह कविता शामिल होगी, बहुत बहुत बधाई आदरणीय विजय निकोर जी.

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 28, 2015 at 5:46pm
बड़ी गहराई से लिखा है आपने आदरणीय विजय निकोर जी , ये समस्त जीवन-दर्शन कहाँ सदैव जीवन पर लागू होते हैं , सब मन का एक बहलावा है , हर जीवन स्वयं में एक दर्शन है , और कुछ न कुछ नया दृष्टांत प्रस्तुत करता है , हम न देख पाएं यह अलग है। बहुत ही खूबसूरत रचना पर अनेकानेक बधाइयां , सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 28, 2015 at 5:22pm

अघट के हो जाने के पश्चात तर्क नहीं अनुभूतियों की आरोप्य सच्चाई कितनी टीस भरी होती है ! आपकी संवेदना से उसे सटीक शब्द मिले हैं, आदरणीय विजयजी.

सादर शुभकामनाएँ. 

Comment by vijay nikore on April 28, 2015 at 4:34pm

 रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मिथिलेश जी।   

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
yesterday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
yesterday
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
Sunday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
Saturday
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
Saturday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
Saturday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
Saturday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service