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अंतिम शब्द

द्वार खुला था

तुम दहलीज़ पर अहम्‌ के जूते उतार

सुस्मित शरद चाँदनी-सी कभी

कभी भोर की प्रथम किरण बनी

बाँहें फैलाए घर के भीतर चली आई

तुमने जिसे मंदिर बनाया

वह आँसू-डूबा उल्लास-भरा

मेरा मन था।

मन पावन था पावन रहा

कब कहा मैंने भगवान हूँ मैं

तुमने मुझको भगवान बनाया

और अब असीम बेरहमी से सहसा

जूतों समेत मेरे सीने पर चल कर

तुम्हारा प्रहार पर प्रहार ... उफ़ !

भीतर नभ में कितने तारे फूटे

कानों में पिस्तौल बन्दूक की ध्वनियाँ

कंपित मन लिए दुख की कथाएँ

बेमाप अकेले में कराह उठा

"हे   रा...म"

-------

-- विजय निकोर

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by VIRENDER VEER MEHTA on March 26, 2015 at 10:22am

आदरणीय विजय निकोर जी  मार्मिकता लिए जिस प्रकार आप ने शब्दों को अभिव्यक्त किया है वह निस्संदेह दिल को छूती  है.....हार्दिक बधाई स्वीकार करे।

Comment by Hari Prakash Dubey on March 26, 2015 at 10:17am

आदरणीय विजय निकोर सर , काफी अंतराल के बाद आपकी  रचना पड़ने को मिली ,बहुत ही सशक्त ,समसामयिक इस रचना पर हार्दिक बधाई आपको सर ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on March 26, 2015 at 4:05am
श्रद्धेय, आपकी इस मार्मिक रचना पर प्रतिक्रियाएँ देखकर असमंजस में हूँ....क्योंकि....आदरणीय पाठकों ने जो समझा है शायद वैसा कहना कवि का उद्देश्य नहीं. सम्भवत: यह रचना महात्मा गांधी के प्रति हाल में जो अपमानजनक आचरण हुआ है उसी ओर इंगित करता है. सादर.
Comment by Sushil Sarna on March 25, 2015 at 5:05pm


आदरणीय बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति है .... इस दिल को छूती प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by somesh kumar on March 25, 2015 at 11:33am

कविता की भावनाओं में खो सा जा रहा हूँ |इस वेदना को अनुभव किया है |इसलिए इस रचना के साथ आत्मसात हो गया |

मर्म के प्रति स्वीकृति प्रेषित है |

सादर 

Comment by Shyam Mathpal on March 24, 2015 at 9:10pm

आदरणीय विजय निकोर जी,

मार्मिक रचना .बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 24, 2015 at 8:41pm

आदरणीय विजय निकोर सर, सशक्त प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. आपकी कविता की इन पंक्तियों से मुझे ग़ज़ल का मतला मिल गया... हार्दिक आभार 

कब कहा मैंने भगवान हूँ मैं

तुमने मुझको भगवान बनाया

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 24, 2015 at 5:21pm

आ० निकोर जी

इस कविता ने मुझे सकते में डाल दिया . दहलीज पर कर तो नवोढ़ा ही आती है . पर कविता का पर्यवसान !. ईश्वर मैडम निकोर को शतायु करें . अभी अंतिम शब्द नहीं  . सादर .

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on March 24, 2015 at 1:28pm
सत्य ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई पखेरू उन्मुक्त गगन में उड़ता हुआ किसी शिकारी के तीर से बिंध गया हो बहुत मार्मिक समापन है आदरणीय सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 24, 2015 at 12:32pm
आदरणीय विजय निकोर जी , आपकी यह रचना पढ़ कर अंग्रेजी की यह पंक्तियाँ याद आ गयीं : When it enters , it enters silently , when it goes , it bangs all the doors . ( do I need to tell it is for love )
रचना भावपूर्ण है , प्रसंशनीय है , बधाई , सादर।

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