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लघुकथा : सुकून (गणेश जी बागी)

                         व्यंग्यात्मक शैली में लिखने के लिए जाना जाता है, उसकी कवितायेँ बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से राजनेताओं पर तीखी मार करती हैं, उसकी कविता प्रतिष्ठित अखबार के साहित्यिक स्तम्भ में आज प्रकाशित हुई है, कल से ही वो परेशान और बेचैन था, जाने क्या होगा, पता नहीं उसकी अभिव्यक्ति को लोग समझ भी पाएंगे अथवा नहीं, रात भर वह सो न सका ।
                        सुबह होते ही मोबाइल की घंटियां बजने लगी, उसका मन शांत था और चेहरे पर सुकून के भाव थे, उसकी अभिव्यक्ति समझ ली गयी थी, गालियों संग धमकियों का दौर चालू हो गया था ।

(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट => अतुकान्त कविता : पगली

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Comment by vijay nikore on December 4, 2014 at 5:05pm

अति सुन्दर लघु कथा। बधाई।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 4, 2014 at 11:54am

सादर नमन, सर. लघुकथा में आपका अनुभव, बहुत कसावट के साथ उभर कर आता है. आपकी लेखनी को नमन, ह्रदय से बधाई स्वीकार कीजियेगा


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 3, 2014 at 8:16pm

प्रिय नीरज मिश्रा जी, आपके विचारों का हृदय से स्वागत है, लघुकथा पर आपकी टिप्पणी उत्साहवर्धन करती है, बहुत बहुत आभार ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 3, 2014 at 8:11pm

आदरणीय जवाहर लाल जी, आपकी टिप्पणी सदैव मुझे प्रोत्साहित करती है, बहुत बहुत आभार।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 3, 2014 at 8:08pm

सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय श्याम नारायन वर्मा जी।

Comment by Hari Prakash Dubey on December 3, 2014 at 7:33pm

आदरणीय सर ,बहुत ही सुन्दर लघुकथा है,हार्दिक बधाई आपको !!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2014 at 7:13pm

आदरणीय बागी जी

गालियों संग धमकियों का दौर चालू हो गया  था  i   वाह----- इस पंच लाईन  ने  कमाल कर दिया  i  क्रांतिकारी  लेखन ऐसा ही होता है  i मुक्तिबोध ने जब 'अँधेरे में'  फैंटेसी लिखी तो नेहरू की नीतियों की मुखर आलोचना के  कारण  उसे जब्त कर लिया गया i बाद मेंजयपुर कोर्ट के आदेश पर  विवादित अंश हटाकर उसे  छापा गया   i यह रचना विवादित अंश हट जाने पर भी  अपने  नए रूप में आज तक  राजनेताओ को डराती है  i सादर i

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 3, 2014 at 6:13pm
सुन्दर , सार्थक. बधाई आदरणीय गणेश जी बागी जी।
Comment by Sushil Sarna on December 3, 2014 at 4:17pm

आदरणीय  Er. Ganesh Jee "Bagi" जी लघु कथा 'सुकून ' वास्तव में दिल को छूने वाली अनुभूति को अपने में समेटे है ।किसी हद तक मैं आदरणीय नीरज मिश्रा जी के वक्तव्य से सहमत हूँ।  इस सुंदर संदेशात्मक लघु कथा की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।  

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 3, 2014 at 1:53pm

आदरणीय बागी सर . इस सुंदर संदेशप्रद लघु कथा के लिए तहे दिल बधाई सादर 

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