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कैसे बचेगी पत्रकारिता की मान-मर्यादा ?

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में पत्रकारिता की मान-मर्यादा कैसे बचेगी, यह किसी को तो सोचना होगा। तमाम दुनिया को आईना दिखाने वाले और खुद को पाक साफ होने का दावा करने वाले चैनल या अखबार क्या वास्तव में वैसे ही हैं, जैसा वे खुद को पेश करते हैं ? पीत पत्रकारिता लगातार हावी होती जा रही है। आए दिन खबरें सुनने को मिल रही हैं कि फलां पत्रकार ब्लेकमेलिंग करते धरा गया, फलां रिपोर्टर महिला शोषण के आरोप में जेल गया, फलां पत्रकार को लोगों ने पीटा। खबरों के साथ… Continue

Added by ratan jaiswani on October 13, 2010 at 8:30am — No Comments

मैं ना तेरी बात का कायल

मैं ना तेरी बात का कायल
करता मेरा मन तू घायल

घर का आंगन झूम रहा है
छ्म-छ्म करती तेरी पायल

कांव-कांव है कौवा करता
मीठा-मीठा बोले कोयल

बरसेगा ये बेदम हो कर
आसमान पर उमड़ा बादल

माथे पे तेरे दमके बिंदिया
आंखो में है चमके काजल

"अभिनव"तू क्यूं चिंता करता
हम अच्छे हैं सब में पागल

Added by abhinav on October 13, 2010 at 3:37am — 1 Comment

जो लोग इस जहाँ में वफ़ादार होते हैं

जो लोग इस जहाँ में वफ़ादार होते हैं

दुनिया में आज वो ही गुनाहगार होते हैं



ऐसा न हो कहीं के सजा इनको भी मिले

कुछ लोग क्यूँ हमारे तरफदार होते हैं



वो ज़ुल्म भी करें तो उन्हें सब मुआफ है

हम उफ़ भी करते हैं तो ख़तावार होते हैं



हरगिज़ न उतरें इश्क के दरिया में नौजवान

दरया-ऐ-इश्क में कई मझदार होते हैं



एहसास-ऐ-कमतरी में रहते हैं जो मुब्तिला

वो भी दिल-ओ-दिमाग से बीमार होते है



छब्बीस जनवरी हो या स्वतंत्रता दिवस

हम लोगों… Continue

Added by Hilal Badayuni on October 12, 2010 at 11:55pm — 6 Comments

चलो निरंतर..चलो निरंतर.

जिसके पैर न रुकना जाने ,

जिसके हाथ न थकना जाने

सुनो ध्यान से ;

हरदम उसका

भाग्य-लक्ष्मी पीछा करती...

सखा उसी का होता ईश्वर...

जग में वही सफल होता है .

और वही रोता है हरदम...

दुखी दरिद्री भी होता है

पाप उसी को सदा दबाते

कर्महीन जो नर होता है.

त्याग नींद आलस्य इसीसे

शुभ कर्मो को करो निरंतर ...

.......चलो निरंतर -१-



सोये पड़े व्यक्ति का देखो

सोया पड़ा भाग्य रहता है

उठ बैठे तो भाग्य उठेगा

चल पड़ने से चल निकलेगा… Continue

Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on October 12, 2010 at 11:00pm — 1 Comment

सुबह

उदासी के अँधेरे हटा कर
नई रौशनी फैलाये गी
मेरे मन के वन उपवन में
सबरंग के फूल खिलाये गी
आस कि मासूम कली
नहीं जब मुर्झायेगी
मेरी उम्मीदों की नय्या
लहरों पर समय की .
चलेगी
पर जायेगी'
मन हर्शाएगी;
कभी तो कोई सुबह,
मेरे लिए
ढेर खुशियाँ लेकर आयेगी .
वो सुबह जरूर आयेगी


--
दीप्ज़िर्वि९८१५५२४६००

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 10:28pm — No Comments

अजी लो आप को भी इश्क आखिर हो गया ना

अजी लो आप को भी इश्क आखिर हो गया ना .

अरे सुख चैन देखो आप का भी खो गया ना.



बड़ा दावा ,ये था किह इश्क से होता क्या है ?!

अजी लो देखलो दिल आपका तोह भी गया ना .?!



हमे कहते थे मजनूं; आप लेकिन आप का ही ,

जनून-ए-इश्क की वहशत में दिल अब खो गया ना ?!



चिरागां हो सकेगा गर जलाओगे यहाँ दिल

करोगे कुछ नया तो ही कहोगे कुछ नया ना



तराना प्यार का ;दिलबर ! सुनाओ, तो सुनेंगे ;

फसाना इश्क का ,हर बार होता है नया ना



जलेंगे दीप से जब दीप ऐ… Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 7:44pm — No Comments

इस बार...

(मेरी ये रचना बिल्कुल नवीन, अप्रकाशित और अप्रसारित है।)





इस बार दशहरे पे नया काम हम करें,

रावण को अपने मन के चलो राम हम करें ।



दूजे के घर में फेंक के पत्थर, लगा के आग,

मज़हब को अपने-अपने न बदनाम हम करें ।



उसका धरम अलग सही, इन्सान वो भी है,

तकलीफ़ में है वो तो क्यूं आराम हम करें ।



माज़ी की तल्ख़ याद को दिल से निकाल कर,

मिलजुल के सब रहें, ये इन्तिज़ाम हम करें ।



अपने किसी अमल से किसी का न दिल दुखे,

जज़बात का सभी… Continue

Added by moin shamsi on October 12, 2010 at 5:25pm — 8 Comments

सत्य कब्र से भी निकलकर दौड़ता है

राम थक चूके थे
रावण को बाण मारते -मारते
विभीषण ने बताया
उसकी नाभि में तो अमृत है
राम ने अमृत घट फोड़ दिया
रावण मारा गया ॥

तुम भी थक जाओगे
मेरे दोस्त !!!
सत्य को मारते -मारते
क्योकि ....
सत्य रूपी मानव के
अंग -अंग में अमृत -कलश है ॥

अगर , सत्य को
जिंदा भी दफ़न कर दोगे
मेरे दोस्त ... तो वह
कब्र से निकलकर भी दौड़ने लगेगा ॥

Added by baban pandey on October 12, 2010 at 4:41pm — 3 Comments

बिरहा अग्नि







बिरहा अग्नि



सुंदर छटा बिखरी उपवन में

खुशबु भरी मदमस्त पवन में

अजब सोच है मेरे मन में

सजन संग आज मिलन होगा

बलम संग आज मिलन होगा

---

मैं चातक हूँ स्वाति साजन ,

मैं मयूर सावन है साजन ,'

दीप हो तुम तो स्वाति मैं हूँ

जो तुम सीप तो मोती मैं हूँ ,

हूँ मैं चकोर तेरी मेरे चंदा

क्यों चकोर से दूर है चंदा

वन उपवन सब झूम रहा है ,

मस्त पवन भी घूम रहा है

जाने क्यों…
Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 4:30pm — 1 Comment

आपके दो-चार शब्द .....

सबसे पहले तो मैं ये बताना चाहता हु की क्या आप जानते है की कवियों और कलाकारों को उनके कविता और कला के बदले में क्या मिलता है ?और क्या देना चाहिए?और सबसे अहम् प्रश्न की वे चाहते क्या है ? मैं सबसे पहले इस अहम् प्रश्न का जवाब देना चाहूँगा ,की एक सच्चा कवि और कलाकार अपने मेहनत के बदले न तो आपसे पैसा चाहता है ,न तो आपका दो-चार घंटा समय चाहता है !अगर कुछ चाहता है ,तो वो है आपका प्यार,प्रोत्साहन,सलाह,प्रतिक्रिया -जिसे देने के लिए सिर्फ आपका २ मिनट का समय ही काफी होगा .



जहा तक मेरी अपनी समझ… Continue

Added by Ratnesh Raman Pathak on October 12, 2010 at 4:30pm — 1 Comment

जाने क्या हो गया है आपसे मिलकर मुझको --------

जाने क्या हो गया है आपसे मिलकर मुझको

ढूँढती रहती है दिन रात ये आंखें तुझको

मै दोस्तों से तेरी बात किया करता हूँ

तेरी यादों में सुबह शाम जिया करता हूँ |





और तू है कि मुझे गैर का समझती है

बस यही बात मेरे दिल को भी खटकती है

रोज़ मंदिर में शिवालय में सर झुकाता हूँ

तुम्हे पाने की दुआ मांग के घर आता हूँ |





सामने तुम नहीं होती तो दिल तड़पता है

मै कहीं ढूँढता हूँ ये कहीं भटकता है

फिर कहीं खो गया है इसका पता दो मुझको

छुपा के… Continue

Added by jagdishtapish on October 12, 2010 at 10:36am — 3 Comments

दिल दिल है ...

दिल दिल है शीशा नहीं,
शीशे से भी नाजुक दिल ।
ये दिल दिल का साथी है,
ये दिल दिल का है कातिल ।
यार तुम्हारी बात कहू,
यार तुम्ही तो हो मेरे ।
तुम्ही हो जीवन मेरा,
तुम्ही जीवन का हासिल ।
तेरे दिल की कहता हू,
तेरे दिल की सुनता हु
मेरे दिल की जाने न,
क्यों हो मुझ से तू गाफिल,

deepzirvi@yahoo.co.in
--
deepzirvi9815524600

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 7:00am — 1 Comment

मेरा दिलबर हसीन नही बेशक

मेरा दिलबर हसीन नही बेशक
कोई उस सा कहीं नहीं बेशक .

वो कही की नही है शेह्जादी,
वो है दिल की मेरे खुशी बेशक .

आँखें उसकी न शरबती न सही ,
उस की आँखों में हूँ में ही बेशक .

उसकी आवाज़ में खनक न सही ,
करती है वो मेरी कही बेशक .

दीप बन कर कभी जो मैं आया ,
ज्योति बन कर के वो जली बेशक .
deepzirvi 9815524600

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 6:57am — 2 Comments

लोथ हूँ , लाश हूँ एक गाथा हूँ ।

अकेला नही हूँ पर तन्हा हूँ

दरया होकर भी प्यासा हूँ ।

मरती चिडिया देखूं रो दूँ ,

बेशक मै सब में हंसता हूँ ।

तू सेठानी बेशक बेशक ,

मैं याचक दर पर आया हूँ ।

दाज के लिए दरवाजे पर

बैठी बेटी का पापा हूँ ।

बूढे बाप के खाली बेटे की

लाश उठाते में हाफा हूँ ।

श्वासों की हूँ आवागमन मैं

लोथ हूँ , लाश हूँ एक गाथा हूँ ।


--

deepzirvi9815524600

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 6:56am — 3 Comments

चाँद तन्हा सा प्यासा औ आवारा क्यों हैं ?

चाँद तन्हा सा प्यासा औ आवारा क्यों हैं ?

हाल उस का भी मुझ सा ही खुदारा क्यों है .



था हमें नाज़ बहुत आपकी दानाई पर ,

तेरी नादानी से ये हाल हमारा क्यों है .



खत नहीं फोन नहीं कोई भी नाता भी नहीं ,

मेरे दिलबर को मेरा दर्द गवारा क्यों है .



मैं ने माना की जुर्म होता है सच का कहना ;

है जुर्म ये तो जुर्म इतना ये प्यारा क्यों है.



दीप जल जायेगा जलता ही चला जायेगा ;

तेरा दीवाना फटेहाल बेचारा क्यों… Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 6:30am — 1 Comment

हमे अजमाने की कोशिश न कर

हमे आजमाने की कोशिश न कर

जरा दूर जाने की कोशिश न कर



अगर साथ चलने गवारा न हो .

(तो) बहाने बनाने की कोशिश न कर.



मेरा दामन तुम्हारे लिए ही बना ,

ये कह कर लुभाने की कोशिश न कर .



सिर्फ तेरे आंसू ही मांगे हैं ,अब,

देख ले भाग जाने की कोशिश न कर .



तेरा इतिहास का पोथा थोथा छोडो ,

'आज ' से भाग पाने की कोशिश न कर .



कल अँधेरे में थे; दीप अब है जला .

दीप से मुंह फिराने की कोशिश न कर.



दीप… Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 6:30am — 3 Comments

ग़ज़ल

हर दिन जमाना दिल को मेरे आजमाता है,
मिलता है जो भी, बात उसकी ही चलाता है.

मालूम है मुझको की आईना है सच्चा पर,
ये आजकल, सूरत उसी, की ही दिखता है.

पीना नहीं चाहा कभी मैने यहाँ फिर भी,
मयखाने का साकी, ज़बरदस्ती पिलाता है.

सच है खुदा तू ही मदारी है जहाँ का बस,
हम सब कहाँ है नाचते, तू ही नचाता है.

"मासूम" अब रोना नहीं दुनिया मे ज़्यादा तुम,
इस आँख का पानी उठा सैलाब लाता है.

Added by Pallav Pancholi on October 12, 2010 at 12:00am — 1 Comment

आपस में भाइयों को लड़ाकर चला गया

शैतान अपना काम बनाकर चला गया

आपस में भाइयों को लड़ाकर चला गया



फिर आदतन वो मुझको सताकर चला गया

हँसता हुआ जो देखा रुलाकर चला गया



उल्फत का मेरी कैसा सिला दे गया मुझे

पलकों पे मेरी अश्क सजाकर चला गया



"जाने से जिसके नींद न आई तमाम रात"

वो कौन था जो ख्वाब में आकर चला गया



बदनाम कर रहा था जो मुझको गली गली

देखा मुझे तो नज़रें झुकाकर चला गया



कातिल को जब वफाएं मेरी याद आ गयीं

तुरबत पे मेरी अश्क बहाकर चला… Continue

Added by Hilal Badayuni on October 11, 2010 at 11:00pm — 5 Comments

निर्बाध प्रहशन



मैंने पूछा था

तट की गीली रेत से

जीवन क्या है

और क्या है

तेरी नियति ?

कुचली जाती पैरों से

क्या हुआ विलुप्त

दर्द की

अनुभूति !!!?



उसने हँसकर

कहा-

जीवन क्या

और मरण क्या

नश्वरता का है

प्रहशन ,

कूल**

परिवर्तन

ही बंधन है

मध्य है

जीवन की

निर्बाध गति ।

~शशि रंजन मिश्र



** कूल=… Continue

Added by Shashi Ranjan Mishra on October 11, 2010 at 7:00pm — 1 Comment

लघुकथा: मोहनभोग -संजीव वर्मा 'सलिल'

लघुकथा: मोहनभोग

-संजीव वर्मा 'सलिल'

*

*

'हे प्रभु! क्षमा करना, आज मैं आपके लिये भोग नहीं ला पाया. मजबूरी में खाली हाथों पूजा करना पड़ रही है.



' किसी भक्त का कातर स्वर सुनकर मैंने पीछे मुड़कर देखा.



अरे! ये तो वही सज्जन हैं जिन्होंने सवेरे मेरे साथ ही मिष्ठान्न भंडार से भोग के लिये मिठाई ली थी फिर...?



मुझसे न रहा गया, पूछ बैठा: ''भाई जी! आज सवेरे हमने साथ-साथ ही भगवान के भोग के लिये मिष्ठान्न लिया था न? फिर आप खाली हाथ कैसे? वह मिठाई क्या… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on October 11, 2010 at 6:30pm — 3 Comments

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