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जो लोग इस जहाँ में वफ़ादार होते हैं

जो लोग इस जहाँ में वफ़ादार होते हैं
दुनिया में आज वो ही गुनाहगार होते हैं

ऐसा न हो कहीं के सजा इनको भी मिले
कुछ लोग क्यूँ हमारे तरफदार होते हैं

वो ज़ुल्म भी करें तो उन्हें सब मुआफ है
हम उफ़ भी करते हैं तो ख़तावार होते हैं

हरगिज़ न उतरें इश्क के दरिया में नौजवान
दरया-ऐ-इश्क में कई मझदार होते हैं

एहसास-ऐ-कमतरी में रहते हैं जो मुब्तिला
वो भी दिल-ओ-दिमाग से बीमार होते है

छब्बीस जनवरी हो या स्वतंत्रता दिवस
हम लोगों के यहाँ यही त्यौहार होते हैं

रिश्वत का बोलबाला न हो कैसे ऐ "हिलाल"
जब मरहले इसी से ही हमवार होते हैं

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Comment by Hilal Badayuni on October 17, 2010 at 5:34pm
shukriya aadil bhai
Comment by mohd adil on October 16, 2010 at 5:27pm
bhut khoob jnb bhut khoob. ache ghazil ha
Comment by Hilal Badayuni on October 16, 2010 at 3:50pm
shukriya wafa saahab shukriya
Comment by SYED BASEERUL HASAN WAFA NAQVI on October 15, 2010 at 7:13pm
भाई गाज़ल का मतला बहुत अच्छा है मुबारक हो.
Comment by Hilal Badayuni on October 13, 2010 at 10:07pm
बहुत बहुत शुक्रिया गणेश भाई
जो शेर आपने पसंद किये है वो मुझे भी पसंद है खैर आपकी मुहब्बतों का बहुत शुक्रगुज़ार हु जो आप हमेशा मेरी हौंसला अफजाई फरमाते है

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 13, 2010 at 10:06am
वो हो, वाह वाह वाह , बहुत खूब हिलाल भाई, समुन्द्र से मोती निकाल लाये आप, जबरदस्त शे'र ..........

ऐसा न हो कहीं के सजा इनको भी मिले
कुछ लोग क्यूँ हमारे तरफदार होते हैं

वो ज़ुल्म भी करें तो उन्हें सब मुआफ है
हम उफ़ भी करते हैं तो ख़तावार होते हैं,

बहुत बहुत बधाई इस खुबसूरत ग़ज़ल पर ,

कृपया ध्यान दे...

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