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कलम की नॊंक सॆ

कलम की नॊंक सॆ

===========

फ़ांसी कॆ फन्दॊं कॊ हम,गर्दन का दान दिया करतॆ हैं,

गॊरी जैसॆ शैतानॊं कॊ भी,जीवन-दान दिया करतॆ हैं,

क्षमाशीलता का जब कॊई, अपमान किया करता है,

अंधा राजपूत भी तब, प्रत्यंचा तान लिया करता है,

भारत की पावन धरती नॆं, ऎसॆ कितनॆं बॆटॆ जायॆ हैं,

मातृ-भूमि कॆ चरणॊं मॆं, जिननॆ निजशीश चढ़ायॆ हैं,

दॆश की ख़ातिर ज़िन्दगी हवन मॆं, झॊंकतॆ रहॆ हैं झॊंकतॆ रहॆंगॆ !!

कलम की नॊंक सॆ आँधियॊं कॊ हम,रॊकतॆ रहॆ हैं रॊकतॆ रहॆंगॆ…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 10, 2013 at 8:30pm — 16 Comments

दीवाने कहाँ जायें

अफ़सोस है दुनिया में दीवाने कहाँ जायें.

शम्मा से भला बचकर परवाने कहाँ जायें.



यातना वंचना असह्य हो,

सहचरी वेदना बनी सदा.

निर्जन पथ निर्मम मीत मिला,

व्याकुल करती मदहोश अदा.

उलझन में पड़ा जीवन सुलझाने कहाँ जायें.

शम्मा से भला बचकर परवाने कहाँ जायें.



पल में विचलित कर देती हैं,

ये प्यार मुहब्बत की बातें.

नयनों मे कोष अश्रुओं का,

क्यूँ काटे नहीं कटती रातें.

राँझा की तरह बोलो मिट जाने कहाँ जायें..

शम्मा से भला बचकर परवाने कहाँ…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on January 10, 2013 at 8:00pm — 10 Comments

हाइकु मुक्तिका: संजीव 'सलिल'

हाइकु मुक्तिका:संजीव 'सलिल'

*

जग माटी का

एक खिलौना, फेंका

बिखरा-खोया.

फल सबने

चाहे पापों को नहीं

किसी ने ढोया.

*

गठरी लादे

संबंधों-अनुबंधों

की, थक-हारा.

मैं ढोता, चुप

रहा- किसी ने नहीं

मुझे क्यों ढोया?

*

करें भरोसा

किस पर कितना,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 10, 2013 at 7:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल : नाव ही नाख़ुदा हो गई

राहबर जब हवा हो गई
नाव ही नाखुदा हो गई

प्रेम का रोग मुझको लगा
और दारू दवा हो गई

जा गिरी गेसुओं में तेरे
बूँद फिर से घटा हो गई

चाय क्या मिल गई रात में
नींद हमसे खफ़ा हो गई

लड़ते लड़ते ये बुज़दिल नज़र
एक दिन सूरमा हो गई

जब सड़क पर बनी अल्पना
तो महज टोटका हो गई

माँ ने जादू का टीका जड़ा
बद्दुआ भी दुआ हो गई

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 10, 2013 at 4:30pm — 20 Comments

जाने कौन कहां से आकर

जाने कौन कहां से आकर

मुझको कुछ कर जाता है

मेरी गहरी रात चुराकर

तारों से भर जाता है

जाने कौन.........



देख नहीं मैं पाउं उसको

दबे पांव वह आता है

और न जाने कितने सपने

आंखों में बो जाता है

जाने कौन.......



एक दिन उसको चांद ने देखा

झरी लाज से उसकी रेखा

मारा-मारा फिरता है अब

दूर खड़ा घबराता है

जाने कौन....



चैताली वो रात थी भोली

नीम नजर भर नीम थी डोली

वही तराने सावन-भादो

उमड़-घुमड़ कर गाता है …

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Added by राजेश 'मृदु' on January 10, 2013 at 3:00pm — 6 Comments

मौन का,इम्तिहान न लो ..!!

नोंच डालो ,

अस्मिता को ,बेच डालो ,

हम यही कहते रहेंगे

मौन का ...

इम्तिहान न लो ..!!

सूरज से युद्ध 

करने का  दुस्साहस

करता जुगनू प्रतिदिन

आकाश बँधाता ढाढस

ज़ुल्म हम सहते रहेंगे ,

हम यही कहते रहेंगे

शौर्य का

अनुमान न लो ..!!

चीखती रह जाएँगीं

विधवा घाटियाँ

जर्जर सी छत की

छूट गईं लाठियाँ

प्रतीक्षारत ,आक्रमण का

अनुचित परिणाम न हो

हम यही कहते रहेंगे ,

हौसले का ,

अनुमान न लो ..!!

मौन का,इम्तिहान न…

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Added by भावना तिवारी on January 10, 2013 at 2:30pm — 5 Comments

हाथ मिलाते रहिये

दिल मिले या ना मिले हाथ मिलाते रहिये,

प्यार की रस्म को आगे बढ़ाते रहिये |



अंधेरों मे ही ना गुजर जाय जीवन का सफ़र,

प्यार की शमा को दिल मे जलाते रहिये |



रहता यूँ चमन मे बिजलियों के गिरने का डर,

चाहत के फूलों को दिल मे खिलाते रहिये |



रोने गाने मे हो ना जाएँ सारी उमर तमाम,

उलफत के जाम को खुद पीकर पिलाते रहिये |



चले है जब तो मिल ही जाएगी मंज़िल हमको

अलबिदा कहते हुए हाथ हिलाते रहिये |

  • Dr.Ajay Khare…
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Added by Dr.Ajay Khare on January 10, 2013 at 2:30pm — 3 Comments

प्रहार

प्रहार 

दहक उठे अंगारे धरती हुई रक्त से फिर पग पग  लाल 

जूझ पड़े वीर बाँकुरे झुके नहीं हँस  कटा दिए निज भाल
माँ  के लहराते आँचल में कायर  अरि  कंटक नित फंसाते 
धन्य है  भारत वीर भूमि जहाँ  बलिदानी पलकन चुनते जाते 
अरि मर्दन करने को खड़े रहते सीमा  पर प्रहरी  सीना  ताने 
हर बार लड़े  हर बार मिटे…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 10, 2013 at 2:01pm — 6 Comments

मुक्तिका: क्या कहूँ?... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

संजीव 'सलिल'

*

क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाता.

बिन कहे भी रहा नहीं जाता..



काट गर्दन कभी सियासत की

मौन हो अब दहा नहीं जाता..



ऐ ख़ुदा! अश्क ये पत्थर कर दे,

ऐसे बेबस बहा नहीं जाता.



सब्र की चादरें जला दो सब.

ज़ुल्म को अब तहा नहीं जाता..



हाय! मुँह में जुबान रखता हूँ.

सत्य फिर भी कहा नहीं जाता..



देख नापाक हरकतें जड़ हूँ.

कैसे कह दूं ढहा नहीं जाता??



सर न हद से अधिक उठाना तुम…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 10, 2013 at 10:30am — 5 Comments

मुक्तिका : संजीव 'सलिल'

मुक्तिका :

नया आज इतिहास लिखें हम

संजीव 'सलिल'


*

नया आज इतिहास लिखें हम.

गम में लब पर हास लिखें हम..



दुराचार के कारक हैं जो

उनकी किस्मत त्रास लिखें हम..



अनुशासन को मालिक मानें

मनमानी को दास लिखें हम..



ना देवी, ना भोग्या मानें

नर-नारी सम, लास लिखें हम..



कल की कल को आज धरोहर

कल न बनें, कल आस लिखें हम..

(कल = गत / आगत / यंत्र / शांति)



नेता-अफसर सेवक…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 10, 2013 at 10:00am — 4 Comments

कट गई है लहर

                           कट  गई  है  लहर

            जाने क्यूँ कुछ ऐसा-ऐसा लगता है

            कि  जैसे  कट  गई  लहर  नदी  से,

            वापस न लौट सकी है,

            और ज़िन्दगी इस कटी लहर में धीरे-धीरे

            तनहा  तिनके  की  तरह …

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Added by vijay nikore on January 9, 2013 at 6:00pm — 7 Comments

कभी तो पास में आकर सदा सुनो दिल की

==========ग़ज़ल===========

कभी तो पास में आकर सदा सुनो दिल की
ज़रा सी चाह और ये इल्तजा सुनो दिल की

कहीं भी आप रहो हो न कोई दर्दो गम
जुबाँ से मेरे निकलती दुआ सुनो दिल की

छलक गए है जो प्याले निगाह मिलते ही
यूँ ले रही है नज़र क्या रजा सुनो दिल की

ग़ज़ब हुनर जो लिए खेलते हो तुम दिल से
कभी कभी ही सही बेबफा सुनो दिल की

अगर मगर तो हमेशा बजूद में होगा
कभी तो "दीप" यूँ ही बेवजा सुनो दिल की

संदीप पटेल"दीप"

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on January 9, 2013 at 4:27pm — 7 Comments

दामिनी के नाम

आदिकाल से नारी स्वयं में है पहचान,
क्यों कर अबला बनी है सर्वशक्तिमान,
दुर्गा अहिल्या शबरी सावित्री रूप भाता,
दुष्ट दलन श्रृष्टि कर्ता दुःख भंजन माता,
बहना बेटी भार्या बन परिवार में आती,
उड़ेल स्नेह कई रूपों में संस्कार जगाती,
धरती सा सीना इसका वात्सल्य की मूर्ति,
त्याग समर्पण स्नेह से करती इच्छा पूर्ति,
नाहक पुरूष पुरुषार्थ दिखाते लज्जा न आती,
न कोई और रिश्ता हो ये माता तो कहलाती|

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा
९-१-२०१३

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 9, 2013 at 4:00pm — 10 Comments

सुन ले कायर पाकिस्तान

सुन ले कायर पाकिस्तान

नहीं झुकेगा हिन्दुस्तान



बात से पहले समझायेंगे

तुम क्या हो ये बतलायेंगे

भारत के वीरों का गहना 

संयम शांति जतलायेंगे 



अगर समझ फिर भी न पाया 

मारें थप्पड़ खींचें कान ....................... 



गीदड़ की न चाल चलो तुम 

छुप छुप कर न वार करो तुम 

शेरों से लड़ने के खातिर

कुछ हाथी तैयार करो तुम 



बच्चा बच्चा वीर यहाँ का

हमको है खुद पर अभिमान .................................



घुसपैठी को आज तजो…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on January 9, 2013 at 3:54pm — 7 Comments

गीत

हँस-हँस कर करते हैं आँसू ,सुख दुःख का व्यापार ,

बाहर वाली चौखट दुखती , चुभते वन्दनवार !!



मुरझाकर भी हर पल सुरभित ,पात-पात साँसों का,

मन को मजबूती देता है ,संबल कुछ यादों का !

क्षण भर हँसता,बहुत रुलाता,कुछ अपनों का प्यार ,

सारी उमर बिता कर पाया,यह अद्भुत उपहार ..!!



सिहरन नस-नस में दौड़े जब,हाँथ हवा गह जाती,

गुजरी एक जवानी छोटी, बड़ी कहानी गाती !

यूँ तो गँवा चुके हैं अपनी,सज धज सब श्रृंगार ,

है अभिमान अभी तक करता,नभ झुककर सत्कार…

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Added by भावना तिवारी on January 9, 2013 at 2:00pm — 8 Comments

दोहा सलिला: गले मिले दोहा यमक

दोहा सलिला:

गले मिले दोहा यमक

संजीव 'सलिल'

*

मनहर ने मन हर लिया, दिलवर दिल वर मौन.

पूछ रहा चितचोर! चित, चोर कहाँ है कौन??

*

देख रही थी मछलियाँ, मगर मगर था दूर.

रखा कलेजा पेड़ पर, कह भागा लंगूर..

*

कर वट को सादर नमन, वट सावित्री पर्व.

करवट ले फिर सो रहे, थामे हाथ सगर्व..

*

शतदल के शत दल खुले, भ्रमर करे रस-पान.

बंद हुए शतदल भ्रमर, मग्न करे गुण-गान..

*

सर हद के भीतर रखें, सरहद करें न पार.

नत सर गम की गाइये,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 9, 2013 at 11:30am — 6 Comments

इंतज़ार ..

इन दिनों 

जैसे ही सूरज 
झील में पनाह लेता है 
पंछियों के झुण्ड 
और भेड़ों की रेवड़ 
अपने अपने घर 
कुछ जल्दी लौटती है 
........
सांवली सी 
कोमल 
स्निग्ध शाम  
पहाड़ों की सीढ़ियों पर 
पैर जमाये 
धीरे से  उतरती है 
कितने लम्हे 
कोहरे की चादर लपेटे  
सामने ठहरते हैं 
तुम्हारी एक  पुकार के 
इंतज़ार…
Continue

Added by rajluxmi sharma on January 9, 2013 at 8:15am — 10 Comments

नर्म से अहसास बन लें

हर तरफ हैं रंग कितने 

आओ चुन लें 

 

भाव के मोती बिछे हैं…

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Added by seema agrawal on January 9, 2013 at 7:32am — 12 Comments

" खुशकर "

जिस तरह दिनकर चमकता
व्योम में,
अलविदा कहता निशा को,
बादलों के झुण्ड को
पीछे धकेले ।

काश होता एक सूरज
ख़ुशी का भी ।

कोई तापता धूप सुबह की,
कोई बिस्तर डाल देता दोपहर के घाम में ।
खुशनुमा गरमी भी होती
कम व ज्यादा,
पूष से ज्येष्ठ तक ।
और पसीना भी निकलता,
इत्र सा ।

काश कल्पा हो उठे साकार,
एक 'खुशकर' हो भी जाये
दिवाकर सा ।।

Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on January 8, 2013 at 7:30pm — 6 Comments

भौंरों के गुंजार से भी उठ रहा गहरा धुआं

पिंजड़े होकर सजग
देखते हैं आड़ से
धातुमय आवेग ताने
बढ़ रहा क्‍या भार से
एकरंगी ताल-पोखर
सांवली परछाईयां…
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Added by राजेश 'मृदु' on January 8, 2013 at 11:30am — 4 Comments

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