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2122 1122 1122 22

ख़्वाब से जाग उठे शाह सदा दी जाए
पकड़े जायें अभी क़ातिल वो सज़ा दी जाए

बख़्श दी जाए कहीं जान ख़वातीनों की
अब तो ज़ालिम को कड़ी कोई सज़ा दी जाए

घूमते हैं वो दरिन्दे भी नकाबों में अब तो
जितना जल्दी हो उन्हें मौत बजा दी जाए

लोग अच्छे ही परेशान हैं वहशी दरिन्दों
इन्तिहाँ हो गयी अब लौ वो बुझा दी जाए

ज़ात इन्साँ की पशेमाँ है ज़रायम से 'चेतन'
तूफाँ कोई तो उठा कर वो दवा दी जाए

मौलिक व अप्रकाशित
प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'

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Comment by Sushil Sarna on January 11, 2024 at 8:24pm
वाह आदरणीय जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल बनी है । हार्दिक बधाई सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2023 at 8:24am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। हार्दिक बधाई।

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