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दो क्षणिकाएँ ...

पुष्प
गिर पड़े रुष्ट होकर
केशों से
शायद अभिसार
अधूरे रहे
रात में

........................

मौन को चीरता रहा
अंतस का हाहाकार
कर गयी
मौन पलों का शृंगार
वो लजीली सी
हार


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 598

Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 30, 2019 at 8:41pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  जी आपकी ऊर्जावान प्रशंसा से सृजन धन्य हुआ , तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by नाथ सोनांचली on November 28, 2019 at 8:34pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बड़ी सी बात को चंद पंक्तियों में कहना कोई आपसे सीखें। ग़ज़ज़्ब। बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by Sushil Sarna on November 26, 2019 at 4:05pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on November 25, 2019 at 2:40pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी क्षणिकाएँ लिखीं आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on November 23, 2019 at 2:16pm

आदरणीय   Dr. Vijai Shanker  जी सृजन आपकी प्रेरक प्रतिक्रिया का दिल से आभारी है।

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 23, 2019 at 6:29am

बहुत खूब , क्षणिकाएं , बधाई , आदरणीय सुशील सरना जी , सादर।

Comment by Sushil Sarna on November 21, 2019 at 7:46pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी सृजन आपकी प्रेरक प्रतिक्रिया का दिल से आभारी है।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 20, 2019 at 7:30pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर क्षणिकाएँ हुई हैं । हार्दिख बधाई ।

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