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चंद क्षणिकाएँ :

चंद क्षणिकाएँ :

मन को समझाने
आई है
बादे सबा
लेकर मोहब्बत के दरीचों से
वस्ल का पैग़ाम

............................

रात
हो जाती है
लहूलुहान
काँटे हिज़्र के
सोने नहीं देते
तमाम शब

............................

रात
जितने भी
नींदों में ख़वाब देखे
उतने
सहर के काँधों पर
अजाब देखे

...............................

हया
मोहब्बत में
हो गयी
बेहया

..............................


याद में
हो जाएंगी
नमनाक नज़रें
राज़ खुल जाएँगे
तुमने जो उठाई
अपनी

नज़रें

.............................


सुलझाने में
उलझ गए हम
ज़ुल्फ़ों के ख़म

बेपरवाह अंगड़ाईयाँ
मिट गए उश्शाक़
आतिश में
हुस्न की
(उश्शाक़ =आशिक का बहुवचन )


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 31, 2019 at 6:50pm

आदाब। बेहतरीन क्षणिकायें। हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना साहिब। सभी कठिन उर्दू शब्दों के अर्थ हम जैसे पाठकों के लिए निवेदित।

Comment by Sushil Sarna on October 31, 2019 at 11:51am

आद0  KALPANA BHATT ('रौनक़')जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 30, 2019 at 5:29pm

भावपूर्ण क्षणिकाएँ! हार्दिक बधाई आदरणीय सुनील सरना जी|

Comment by Sushil Sarna on October 30, 2019 at 4:39pm

आदरणीय डॉ.गीता चौधरी जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का तहे दिल से शुक्रिया। सृजन आपकी प्रेरक टिप्पणी का आभारी है। हार्दिक आभार।

Comment by Dr. Geeta Chaudhary on October 30, 2019 at 10:46am

आदरणीय सुशील सरना जी आपकी क्षणिकाओं को मै बार बार पढती हूँ, और शायद यही किसी रचना की खूबसूरती का पैमाना हैI सभी क्षणिकाएं बहुत ही अच्छी लगी... पर "याद में हो जायेंगी........" बहुत सुंदर हैI सर बहुत बहुत बधाई आपकोI

Comment by Sushil Sarna on October 29, 2019 at 2:12pm

आदरणीय समीर कबीर साहिब, आदाब ... आपके मार्गदर्शन का तहे दिल से शुक्रिया। हो सकता है मेरे से ही कहीं गलती हो गई हो। असुविधा के लिए क्षमा। आपका स्नेह मेरी अमूल्य निधि है। हार्दिक आभार। अभी एडिट कर देता हूँ सर। सदर नमन। 

Comment by Samar kabeer on October 28, 2019 at 7:20pm

सहीह शब्द "सहर" है,जिसका अर्थ है सुब्ह ।

और "सह्र" का अर्थ होता है जादू ।

आपको ग़लत याद रह गया मैं ऐसी भूल सपने में भी नहीं करता ।

Comment by Sushil Sarna on October 28, 2019 at 6:38pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया। जी हाँ, आपने ठीक समझा ... सर मेरे को ऐसा याद आ रहा है कि आपने एक रचना में सहर को सह्र की तरह लिखने का मशवरा दिया था कृपया मार्गदर्शन करें कि कौन सा सही है। तकलीफ के लिए क्षमा चाहूँगा।

Comment by Samar kabeer on October 28, 2019 at 3:45pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी क्षणिकाएँ लिखीं आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'सह्र के काँधों पर'

इस पंक्ति में 'सह्र' का अर्थ जादू होता है,और आप शायद यहाँ सुब्ह के लिए "सहर" लिखना चाहते हैं ।

कृपया ध्यान दे...

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