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ताप संताप दोहे :

ताप संताप दोहे :

सूरज अपने ताप का, देख जरा संताप।
हरियाली को दे दिया, जैसे तूने शाप।।

भानु रशिम कर रही, कैसा तांडव आज।
वसुधा की काया फटी,ठूंठ बने सरताज।।

वसुंधरा का हो गया, देखो कैसा रूप।
हरियाली को खा गई, भानु तेरी धूप।।

मेघो अपने रहम की, जरा करो बरसात।
अपनी बूंदों से हरो, धरती का संताप।।

तृषित धरा को दीजिये, इंद्रदेव वरदान।
हलधर लौटे खेत में, खूब उगाये धान।।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on June 29, 2019 at 2:20pm

आदरणीय विजय निकोर जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on June 29, 2019 at 2:20pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब   .... सृजन आपकी आत्मीय प्रशंसा का आभारी है। आपके द्वारा इंगित त्रुटि सही है मैं इसका संशोधन कर पुनः प्रेषित करूंगा।  इस हेतु आपका हार्दिक आभार।  आपके द्वारा इंगित त्रुटि सही है मैं इसका संशोधन कर पुनः प्रेषित करूंगा।  इस हेतु आपका हार्दिक आभार। 

Comment by vijay nikore on June 23, 2019 at 4:17pm

बहुत ही सुन्दर दोहे रचे हैं। बधाई सुशील जी।

Comment by Samar kabeer on June 23, 2019 at 3:21pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,गर्मी के मौसम पर अच्छे दोहे रचे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'भानु रशिम कर रही, कैसा तांडव आज'

इस पंक्ति के पहले चरण में 11 मात्राएँ हो रही हैं,देखियेगा ।

'मेघो अपने रहम की, जरा करो बरसात'

आप की जानकारी के लिए बता रहा हूँ कि इस पंक्ति के विषम चरण में 'रहम' शब्द का शुद्ध उच्चारण "रह्म" 21 होता है ।

Comment by Sushil Sarna on June 22, 2019 at 4:19pm

आदरणीय     डॉ छोटेलाल सिंह  जी सृजन पर आपके दिलकश प्रशंसा का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on June 22, 2019 at 4:18pm

आदरणीय    narendrasinh chauhan जी सृजन पर आपके दिलकश प्रशंसा का दिल से आभार। 

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on June 21, 2019 at 7:59am

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत ही सुंदर रचना आपने सृजित की,बहुत बहुत बधाई

Comment by narendrasinh chauhan on June 20, 2019 at 7:23pm

खूब सुन्दर दोहावली सर 

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