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ग़ज़ल : रात भर मुझको नचाती, जानते हो?

बह्र : 2122 2122 2122

याद आ आ कर तुम्हारी, जानते हो?

रात भर मुझको नचाती, जानते हो?

 

प्यार करने वाला होता है जमूरा

इश्क़ होता है मदारी, जानते हो?

 

शाइरी में चाँद को कहते हैं सूरज

आग को कहते हैं पानी, जानते हो?

 

हर किसी को मैं समझ लेता हूँ अपना

मुझ में है ये ही ख़राबी, जानते हो?

 

बन्द कमरे की तरह अब हो गया हूँ

मुझमें दरवाज़ा न खिड़की, जानते हो?

 

नक़्द में ही बस मुझे पाओगे अब तुम

बन्द कर दी है उधारी, जानते हो?

 

हर सितम का लूँगा मैं गिन गिन के बदला

मैं भी हूँ पक्का हिसाबी, जानते हो?

 

मेरे अन्दर उस ख़ुदा की राह तकते

मर गया है इक पुजारी, जानते हो?

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Mahendra Kumar on January 7, 2019 at 8:49pm

ग़ज़ल में आपकी उपस्थिति और उत्साहवर्धक टिप्पणी का हृदय से आभारी हूँ आदरणीय गजेन्द्र श्रोत्रिय जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by Gajendra shrotriya on January 6, 2019 at 9:02pm

आदरणीय महेन्द्र कुमार जी सादर अभिवादन। बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने।  रदीफ और कवाफी के साथ साथ कहन में भी नयापन है। बहुत बधाई आपको।

Comment by Mahendra Kumar on January 6, 2019 at 10:12am

बहुत-बहुत शुक्रिया सर. वांछित सुधार कर दिया है. सादर.

Comment by Samar kabeer on January 5, 2019 at 2:19pm

 
'बस नक़द में ही मुझे पाओगे अब तुम'

इस मिसरे में सहीह शब्द है "नक़्द",इसे  यूँ कर लें:-

'नक़्द में ही बस मुझे पाओगे अब तुम'

'हिसाबी' वाला शैर रख लें ।

Comment by Mahendra Kumar on January 4, 2019 at 7:58pm

हृदय से आभारी हूँ आदरणीय तस्दीक अहमद खान जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 4, 2019 at 7:57pm

ग़ज़ल में आपकी उपस्थिति और सराहना का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय तेज वीर सिंह जी. हृदय से आभारी हूँ. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 4, 2019 at 7:56pm

सादर आदाब आदरणीय समर कबीर सर. ग़ज़ल में आपकी उपस्थिति और इस्लाह का हृदय से आभारी हूँ. मतले और छठवें शेर में परिवर्तन कर रहा हूँ. 'हिसाबी' वाले शेर में मैंने 'हिसाबी' को 'गिन गिन' के सन्दर्भ में व्यंग्यात्मक लहजे में प्रयोग किया था, 'बदला' के लिए नहीं. यदि यह इस सन्दर्भ में सही लग रहा है तो ठीक नहीं मैं इसे भी परिवर्तित कर देता हूँ. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on January 3, 2019 at 12:09pm

 ,

जनाब महेंद्र कुमार साहिब, अच्छी ग़ज़ल हुई है, मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 

Comment by TEJ VEER SINGH on January 2, 2019 at 7:39pm

बेहतरीन गज़ल। हार्दिक बधाई ।

हर किसी को मैं समझ लेता हूँ अपना

मुझ में है ये ही ख़राबी, जानते हो?

Comment by Samar kabeer on January 2, 2019 at 11:21am

जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

मतला अगर यूँ कहें तो:-

'याद आ आ कर तुम्हारी,जानते हो

रात भर मुझको नचाती,जानते हो' ?

'यूँ न मुझको मुफ़्त में पाओगे अब तुम

बन्द कर दी है उधारी, जानते हो'

इस शैर के ऊला में 'मुफ़्त' और सानी में 'उधारी' ? ग़ौर करें ।

'हर सितम का लूँगा मैं गिन गिन के बदला

मैं भी हूँ पक्का हिसाबी, जानते हो'

इस शैर के सनी में 'हिसाबी' शब्द उचित नहीं चाहें तो "खिलाड़ी" कर सकते हैं ।

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