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ख्वाब कोई तो मचलना चाहिए

मापनी - 2122 2122 2122 212


जिन्दगी में ख्वाब कोई तो मचलना चाहिए

गर लगी ठोकर तो’ क्या, फिर से सँभलना चाहिए


सीखना ही जिन्दगी है उम्र का बंधन कहाँ

लोग बदलें या न बदलें, खुद बदलना चाहिए


कैद होकर घर में’ बैठोगे भला तुम कब तलक

शाम को इक बार तो घर से निकलना चाहिए


और कितने दर्द देगी जिन्दगी हमको यहाँ

ये अँधेरी रात गम की आज ढलना चाहिए


लात घूँसे छोड़ दो सब, बैठकर बातें करो  

बातों’-बातों में न हरदम ही उछलना चाहिए


आये’ जब भी आँच अपने मान और सम्मान पर

तब हमारा रक्त थोड़ा तो उबलना चाहिए


पीठ पीछे वार पर रखिये सदा तीखी नजर

दाल दुश्मन की यहाँ बिलकुल न गलना चाहिए


मोड़ दो यदि रुख हवा का, तब तो’ कोई बात है

साथ सबके भीड़ बन यूँ ही न चलना चाहिए


कुछ तो’ कम हों आदमी से आदमी की दूरियाँ

बर्फ रिश्तों पर जमी है, अब पिघलना चाहिए

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by gumnaam pithoragarhi on July 19, 2018 at 4:33pm

वाह वाह ग़ज़ल अच्छी लगी ..    बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2018 at 6:23am

आ. भाई बसंत जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 18, 2018 at 10:05pm

जनाब बसंत कुमार साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2018 at 5:41pm

 आदरणीया  Sushil Sarna जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2018 at 5:40pm

आदरणीया Neelam Upadhyaya जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2018 at 5:40pm

आदरणीय  TEJ VEER SINGH जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by babitagupta on July 17, 2018 at 6:16pm

जिंदगी जीने का पूरा फलसफा ब्यान करती बेहतरीन गजल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Sushil Sarna on July 17, 2018 at 5:26pm

आदरणीय दिलकश अशआर की इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 17, 2018 at 10:56am

आदरणीय बसंत कुमार जी, बढ़िया पेशकश   बधाई स्वीकार करें

Comment by TEJ VEER SINGH on July 16, 2018 at 10:24pm

हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी।बेहतरीन गज़ल।

आये’ जब भी आँच अपने मान और सम्मान पर

तब हमारा रक्त थोड़ा तो उबलना चाहिए

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