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उमड़-घुमड़ बदरा नभ छाये,

नाचें वन में मोर.

बाट जोहते भीगीं अँखियाँ,    

आ भी जा चितचोर.

 

तेज हवा के झोंके आकर,

खोल गए खिड़की.

तभी कडकती बिजली ने भी,

दी हमको झिड़की.

 

दादुर, झींगुर डरा रहे हैं,

मचा मचा कर शोर.

 

आया गगन धरा से मिलने,

बाहें फैलाये.

नदिया सागर से संगम को,

मन में अकुलाये.

 

संध्या ले अरमान खड़ी है,

मुस्काती है भोर.

 

हरी-भरी हो गई धरा तो,

आया जब सावन.

मगर तुम्हारे बिना जेठ सा,

तपता मेरा मन.

 

एक बूँद जब गिरी गाल पर,

हृदय गयी झकझोर.  

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2018 at 10:24am

आदरणीय Sushil Sarna जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2018 at 10:24am

आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2018 at 10:24am

आदरणीया  babitagupta  जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 18, 2018 at 10:23am

आदरणीया  Neelam Upadhyaya जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Sushil Sarna on July 17, 2018 at 5:28pm

आदरणीय मौसम के अनुरूप सुंदर और मधुर प्रस्तुति। हार्दिक बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on July 17, 2018 at 3:47pm
सुंदर गीत के लिए तहे दिल बधाई के साथ सादर 
Comment by babitagupta on July 16, 2018 at 9:15pm

चंद पंक्तियों में बरसात के मौसम की पूरी छटा का वर्णन ,बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 16, 2018 at 10:29am

आदरणीय बसंत कुमार जी , बहुत ही बढ़िया गीत की रचना।  बधाई। 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 15, 2018 at 9:50pm

आदरणीय समर कबीर जी को सादर नमस्कार, आपकी समीक्षा का हमेशा ही मुझे इंतजार रहता है, जी उचित है मैं सुधर लेता हूँ. इसी तरह स्नेह बनाये रखें सादर नमन 

Comment by Samar kabeer on July 15, 2018 at 8:21pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत उम्दा और सुंदर गीत रचा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

बाट जोहते भीगीं अँखियाँ,

इस पंक्ति में ' अँखियाँ' शब्द बहुवचन है, इसलिये 'जोहते' को "जोहती" करना उचित होगा, या 'बाट जोहते भीगे नयना'

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