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ग़ज़ल नूर की -जो किताबों ने दिया वो फ़लसफ़ा अपनी जगह.

२१२२/२१२२/२१२२/२१२ 
.
जो किताबों ने दिया वो फ़लसफ़ा अपनी जगह.
लोग जिस पर चल पड़े वो रास्ता अपनी जगह.
.
फिर लिपटकर रो सकूँ मैं ये दुआ अपनी जगह
लौट कर आए न तुम मैं भी रहा अपनी जगह.
.
हक़ बयानी का सभी को हौसला होता नहीं  
संग हैं बेताब फिर भी आईना अपनी जगह.   
.
छोड़ कर मुझ को तेरा क्या हाल है यह तो बता
तेरे पीछे हश्र मेरा जो हुआ अपनी जगह.
.
ये वो मंजिल तो नहीं है आज पहुँचे हैं जहाँ
गो तुम्हारे साथ चलने का मज़ा अपनी जगह.
.
हम ने भी देखा है अपने दिल की बातें मान कर
है अमल अपनी जगह और मश्विरा अपनी जगह.
.
कामयाबी चाहिए तो सीख ले तू ये हुनर
रख ज़ुबां शीरीं हमेशा रख अना अपनी जगह.
.
एक मुट्ठी राख से ज़्यादा नहीं है ज़िन्दगी
दौलत-ए-दुनिया अलग है कुल जमा अपनी जगह.  
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित  

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2018 at 12:31pm

धन्यवाद आ. दिनेश जी 
ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया का बहुत बहुत आभार 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 19, 2018 at 7:16pm

जनाब नीलेश नूर साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें ।

शेर2 के सानी में तुम की जगह वह कर सकते हैं ।आखरी शेर में क़ाफ़िया बदलना पड़ेगा ।सादर

Comment by Samar kabeer on April 19, 2018 at 2:59pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

मतले के दोनों मिसरों में 'ह' ख़फ़ी के क़ाफ़िये आ गए हैं,जो उर्दू के लिहाज़ से ग़लत माने जाते हैं,ये आप जानते भी हैं ।

दूसरे शैर के सानी मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देख लें ।

आख़री शैर में क़ाफ़िया दोष है,सही शब्द है "जम'अ" देखियेगा ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 19, 2018 at 1:02pm

आदरणीय भाई निलेश जी एक और शसक्त रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Neelam Upadhyaya on April 19, 2018 at 12:58pm

"हक़ बयानी का सभी को हौसला होता नहीं   संग हैं बेताब फिर भी आईना अपनी जगह"    आदरणीय नीलेश जी, बेहतरीन गज़ल । मुबारकबाद ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 19, 2018 at 11:26am

हार्दिक बधाई आदरणीय नीलेश जी।बेहतरीन गज़ल।

एक मुट्ठी राख से ज़्यादा नहीं है ज़िन्दगी 
दौलत-ए-दुनिया अलग है कुल जमा अपनी जगह.  

Comment by Harash Mahajan on April 19, 2018 at 9:41am

वाह  जनाब वाह क्या बात है आदरणीय नीलेश जी ।

हर बात अपनी जगह दुरुस्त है ।

मेरी जानिब से ढ़ेरों दास सर ।

सादर !

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2018 at 9:23am

वाह लाजबाब एक से बढ़कर एक शेर, बधाई हो आपको , क्या कहने 

Comment by दिनेश कुमार on April 18, 2018 at 8:39pm

मुश्किल रदीफ़ को बहुत सहजता से निभाया है आपने आदरणीय निलेश सर जी।  सभी अशआर बहुत अच्छे लगे। उम्दा ग़ज़ल के लिये हार्दिक बधाई, सर।

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