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ग़ज़ल निकल गए आँसू,,,,

   2122  1212  22

दफ़अतन जो निकल गए आँसू।

सारे मंज़र बदल गए आँसू।।

लाख की कोशिशें छुपाने की।

राज़ दिल का उगल गए आँसू।।

इक ख़ुशी ने मुझे पुकारा है।

ये ख़बर सुन के जल गए आँसू।।

ख़ुश्क दामन तुझे बताऊँ क्या।

वो सबब जो सँभल गए आँसू।।

इत्तिफ़ाकन ही ख़ुश्क थीं पलकें।

इंतिकामन मचल गए आँसू।।

इक तबस्सुम जो आगया लब पर।

मारे ग़म के पिघल गए आँसू।।

कौन सा पल मुझे हंसाएगा।

मेरी फ़ितरत में ढल गए आँसू।।

हाथ ख़ाली हैं फिर सहर अपने।

लो तुम्हें फिर से छल गए आँसू।।

      मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on December 27, 2017 at 10:52am

उम्दा ग़ज़ल है आ. अफ़रोज़ जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Afroz 'sahr' on December 26, 2017 at 1:56pm
आदरणीय तस्दीक़ जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नवाज़ी का शुक्रिया,,,, लफ़्ज़ "अपने" बहूवचन में है या, एक वचन में मेहरबानी कर बतलाएं,,,,,,
Comment by Afroz 'sahr' on December 26, 2017 at 10:13am

आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नाज़ी का शुक्रिया

Comment by नाथ सोनांचली on December 26, 2017 at 9:26am

आद0 अफ़रोज़ जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 25, 2017 at 8:33pm

जनाब अफ़रोज़ साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

आखरी शेर में अपने को तेरे और तुम्हें को तुझे करने से दोष खत्म हो सकता है ।

Comment by Afroz 'sahr' on December 25, 2017 at 2:06pm
आदरणीय अजय तिवारी साहिब ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नवाज़ी का शुक्रिया,,,,,
Comment by Afroz 'sahr' on December 25, 2017 at 2:04pm
आदरणीय समर कबीर साहिब ग़ज़ल नें शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया,,सादर
Comment by Ajay Tiwari on December 25, 2017 at 12:25pm

आदरणीय अफ़रोज़ साहब, खूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by Samar kabeer on December 24, 2017 at 5:54pm

जनाब अफ़रोज़ 'सहर' साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

दूसरे शैर के ऊला में 'लाख की' को "लाख कीं"कर लें ।

'वो सबब जो सँभल गये आँसू'

इस मिसरे में 'जो' शब्द भर्ती का है, इस बारीकी को समझाने के लिए एक त्वरित सुझाव है,इसमें तनाफ़ुर न देखें :-

'जिस सबब से पिघल गए आँसू'

'मारे ग़म के पिघल गये आँसू'

ग़म के मारे तो आँसू  बहते ही हैं,मेरे ख़याल से ये मिसरा यूँ होना था:-

इस ख़ुशी में पिघल गए आँसू'

आख़री शैर में शुतरगुर्बा देखिये,ऊला में 'अपने',सानी में 'तुम्हें' ।

Comment by Afroz 'sahr' on December 24, 2017 at 5:18pm
आदरणीय निलेश जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नवाज़ी का शुक्रिया,,,,, अर्कान यही हैं । ग़लती से उन में गेप हो गया

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