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ग़ज़ल नूर की - किसी साधू के गहरे ध्यान से हम

२१२२, १२१२, २२ (११२) +१ 
.
किसी साधू के गहरे ध्यान से हम
बैठे रहते है इत्मिनान से हम.
.
तुम हो इक टूटती हुई दीवार
एक ढहते हुए मकान से हम.
.
गर ख़ुदा को वहाँ नहीं पाया,   
लौट आयेंगे आसमान से हम.   
.
बात जो कुछ है साफ़ साफ़ कहें
ऊँचा सुनने लगे हैं कान से हम.
.
बुतकदे में जलाने को दीपक
जाग जाते हैं इक अज़ान से हम.   
.
एक एल्बम में तुम हसीं थी बहुत 
साथ में थे बड़े जवान से हम. 
.
वस्ल का पल, ये जिस्म और वो “नूर”
हट गए अपने दरमियान से हम. 
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 942

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 18, 2017 at 11:23am

शुक्रिया आ. अफरोज़ जी 

व्यस्तता के चलते देर से आने की मुआफ़ी चाहूँगा 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 18, 2017 at 11:22am

शुक्रिया आ. डॉ आशुतोष जी 

व्यस्तता के चलते देर से आने की मुआफ़ी चाहूँगा 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 18, 2017 at 11:22am

शुक्रिया आ. सलीम रज़ा साहब 

व्यस्तता के चलते देर से आने की मुआफ़ी चाहूँगा 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 18, 2017 at 11:22am

शुक्रिया आ. मोहम्मद आरिफ़ साहब.. व्यस्तता के चलते देर से आने की मुआफ़ी चाहूँगा 
सादर 

Comment by Ajay Tiwari on October 18, 2017 at 6:24am

आदरणीय निलेश जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं.

सादर 

Comment by Samar kabeer on October 16, 2017 at 8:47pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'इत्मिनान'ग़लत शब्द है,सही शब्द है "इत्मीनान",देखियेगा ।
'बात जो कुछ है साफ़ साफ़ कहें
ऊँचा सुनने लगे हैं कान से हम'
सानी मिसरे के हिसाब से ऊला मिसरा स्पष्ट नहीं क्योंकि ऊँचा सुनने के साथ ऊँचा या ज़ोर से बोलना उचित है,साफ़ साफ़ नहीं,ग़ौर कीजियेगा ।
'एक एल्बम में तुम हसीं थी बहुत
साथ में थे बड़े जवान से हम'
इस शैर के ऊला मिसरे में 'एल्बम'की जगह 'तस्वीर'बहुत मुनासिब शब्द है,लेकिन शायद इसका तर्क आप ये दें कि पूरी एल्बम ही माज़ी की तस्वीरों की थी,ख़ैर ऊला मिसरे में 'थी'को "थीं"कर लें,और सानी मिसरा यूँ ज़ियादा बहतर होता:-
'साथ में हैं खड़े जवान से हम'
मुझे याद आ रहा है कि यही भाव आपकी किसी पुरानी ग़ज़ल में भी है ?
Comment by दिनेश कुमार on October 16, 2017 at 3:50pm
आ. निलेश सर जी। बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है। वह वाह
सभी शेर उम्दा लगे। दिली दाद। सर,... ऐक से बढ़कर एक
Comment by Afroz 'sahr' on October 16, 2017 at 3:05pm
बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बहुत सारी मुबारकबाद आदरणीय निलेश जी सादर,,,
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 16, 2017 at 2:06pm
आदरणीय नीलेश भाई जी इस उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई
बात जो कुछ है साफ़ साफ़ कहें
ऊँचा सुनने लगे हैं कान से हम.।।।।साफ़ साफ़। और ऊंचा थोडा दुबिधा में हूँ साफ़ साफ़ बात भी धीमे धीमे हो सकती है।।मेरी समझ में कुछ फर्क है अपनी भ्रान्ति के निवारण के लिए जानना चाहता हूँ
Comment by SALIM RAZA REWA on October 16, 2017 at 1:44pm
किसी साधू के गहरे ध्यान से हम
बैठे रहते है इत्मिनान से हम.
एक एल्बम में तुम हसीं थी बहुत
साथ में थे बड़े जवान से हम.
वाह...निलेश जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद.
.

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