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ग़ज़ल - अब हक़ीकत से ही बहल जायें ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212   22 /122
मंज़रे ख़्वाब से निकल जायें

अब हक़ीकत से ही बहल जायें

 

ज़ख़्म को खोद कुछ बड़ा कीजे

ता कि कुछ कैमरे दहल जायें

 

तख़्त की सीढ़ियाँ नई हैं अब

कोई कह दे उन्हें, सँभल जायें

 

मेरे अन्दर का बच्चा कहता है  

चल न झूठे सही, फिसल जायें

 

शह’र की भीड़ भाड़ से बचते

आ ! किसी गाँव तक निकल जायें

 

दूर है गर समर ज़रा तुमसे

थोड़ा पंजों के बल उछल जायें

 

चाहत ए रोशनी में दम है अगर

जुगनुओं की तरह से जल जायें   

*****************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 28, 2017 at 9:41pm

आदरणीय राज भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 28, 2017 at 9:41pm

आदरनीय तसेद्द्क भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार । आपकी सलाह उचित है , पर भाव विरोधी हो रहे हैं , अतः मै स्वीकार करने मे असमर्थ हूँ ... क्षमा कीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 28, 2017 at 9:38pm

आ. सलीम भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on August 28, 2017 at 8:02pm
आदरणीय खूबसूरत शेर कहें हैं बधाई
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 28, 2017 at 9:00am
ज़ख़्म को खोद कुछ बड़ा कीजे
ता कि कुछ कैमरे दहल जायें

तख़्त की सीढ़ियाँ नई हैं अब
कोई कह दे उन्हें, सँभल जायें

शह’र की भीड़ भाड़ से बचते
आ ! किसी गाँव तक निकल जायें
आ. भाई गिरिराज जी सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by राज़ नवादवी on August 27, 2017 at 8:57pm

सुन्दर ग़ज़ल कही भाई गिरिराज भंडारी जी. बधाई हो, मतला खासकर पसंद आया. सादर 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 27, 2017 at 8:45pm
मुहतरम जनाब गिरिराज साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं । शेर 4 के सानी मिसरे को यूं भी कर सकते हैं ।
चल संभल कर न पग फिसल जाएं

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2017 at 1:35pm

आदरनीय कंवर करतार भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2017 at 1:34pm

आदरनीय बसंत भाई , हौसला अफज़ाई का शुक्रिया आपका

Comment by कंवर करतार on August 27, 2017 at 12:18pm
"मेरे अन्दर का बच्चा कहता है
चल न झूठे सही, फिसल जायें"
बहुत सुन्दर... शेर दर शेर.उम्दा ग़ज़ल भंडारी जी।सादंर।

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