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दोहे 
राजनीति   दलदल   यहाँ, मिट्टी  हुई पलीद।
मजहब  मजहब लड़ रहे, कहाँ  दिवाली ईद।।1।।

कहने   को  करवा  रहे,  ये  रोजा   इफ्तार।
मगर  दृष्टि  में  तैरता, वोटों  का  व्यापार।।2।।

बादल  अब  बरसे वहाँ, जहाँ बहुत सा नीर।
सूखी भू  तरसे  कृषक, बढ़ी  जा  रही  पीर।।3।।

सरकारी घन छा गए, रिमझिम पड़े फुहार।
झुलस रहा  भूखा  उदर, तर  होता  बाजार।।4।।

कर्णधार  सुख  भोगते, भ्रष्टाचार  निहाल।
राजनीति  यह  देखकर, हुई  शर्म से लाल।।5।।
 
"मौलिक और अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on February 13, 2019 at 7:02pm

दोहों की प्रशंसा करने के लिए आपका हार्दिक आभार  बसंत कुमार शर्मा जी | 

Comment by Samar kabeer on August 8, 2017 at 9:54pm
मेरे कहे को मान देने के लिये धन्यवाद मुहतरम ।
Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 8, 2017 at 7:11pm

आदरणीय  Samar kabeer साहब,
सादर प्रणाम | 
यह उक्त दोहों की खुशकिस्मती है कि ये आपको पसंद आए | दोहों की प्रशंसा और बधाई देने के लिए आपका हार्दिक आभार | 
आपका सुझाव सिर आँखों पर | तदानुसार दोहे में मैंने संशोधन कर दिया है | इसी प्रकार अपना प्रेम बनाए रखिए और समय समय पर मार्गदर्शन करते रहिएगा | 
सादर | 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 2, 2017 at 8:53am
बहुत ही सुन्दर दोहे सृजित हुए हैं आदरणीय..सादर
Comment by Ashok Kumar Raktale on August 1, 2017 at 8:45pm

आदरणीय सी. एम. उपाध्याय साहब सादर नमस्कार, सभी दोहे सुंदर रचे हैं आपने. आदरणीय समर कबीर साहब का सुझाव भी उत्तम है. सादर.

Comment by Samar kabeer on August 1, 2017 at 6:38pm
जनाब सी.एम. उपाध्याय जी आदाब,बहुत उम्दा दोहे रचे आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

'कहने को तो दे रहे'ये रोज़ा इफ़्तार'
आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि रोज़ा इफ्तार दिया नहीं जाता,करवाया जाता है,इसे यूँ कर सकते हैं :-
"कहने को करवा रहे,ये रोज़ा इफ़्तार"
Comment by narendrasinh chauhan on August 1, 2017 at 6:04pm

बहुत सुंदर दोहे 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 1, 2017 at 5:09pm

बहुत सुंदर दोहे 

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