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ग़ज़ल -- किसी का कहा मानता ही कहाँ है

122--122--122--122

किसी का कहा मानता ही कहाँ है
वो अपनी ख़ता मानता ही कहाँ है

न काफ़िर कहूँ तो उसे मैं कहूँ क्या
है बुत में ख़ुदा मानता ही कहाँ है

है छोटी बहुत सोच उसकी करें क्या
किसी को बड़ा मानता ही कहाँ है

शिकायत यही है हर इक आदमी की
मेरी दूसरा मानता ही कहाँ है

मेरे पास हल है, सभी मुश्किलों का
कोई मश् वरा मानता ही कहाँ है

लगाना पड़ा झूठ का मुँह पे ग़ाज़ा
कि सच आइना मानता ही कहाँ है

भला आदमी है उसे कुछ भी कहदो
किसी का बुरा मानता ही कहाँ है

रक़ीबों के झाँसे में आया है दिलबर
मुझे बावफ़ा मानता ही कहाँ है

हुक़ूमत है 'खुरशीद' अब तीरगी की
मगर हौसला मानता ही कहाँ है
मौलिक और अप्रकाशित

'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर । 09413408422

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Comment by रामबली गुप्ता on July 21, 2017 at 7:31am
भाई खुर्शीद जी मुग्ध कर दिया आपकी इस शानदार ग़ज़ल ने। मतले से लेकर मक्ते तक हर शैर दमदार है। दिल से बधाई स्वीकार करें।सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 20, 2017 at 11:47pm

बहुत खूब, आदरणीय खुर्शीद भाई. अव्वल तो मंच पर आपका पुनः स्वागत है. फिर इस गहरी ग़ज़लग़ोई के लिए बधाइयाँ पेश है. रदीफ़ लम्बा हो तो कहन को साधना एक कठिन काम है. लेकिन आपने इस काम को बहुत ही होशियारी से निभाया है. कहन के हिसाब से सभी शेर उम्दा बन पड़े हैं. 

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 16, 2017 at 9:22pm

वाह्ह्ह बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है मोहतरम जनाब खुर्शीद खैराडी जी शेर दर शेर मुबारक बाद कुबूलें 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 16, 2017 at 2:42pm

वाह वाह बेहद खुबसूरत ग़ज़ल कही है अपने आदरणीय खुर्शीद जी . हार्दिक बधाई आपको .

Comment by narendrasinh chauhan on July 15, 2017 at 4:32pm

बहुत खूबसूरत 

Comment by Samar kabeer on July 13, 2017 at 11:11am
जैसा कि आप जानते हैं ये मंच सीखने सिखाने का मंच है, और आप ही की तरह मैं भी इसी मिटटी से पैदा हुआ हूँ,और आपने जो कहा है उसे मैं समझता हूँ,लेकिन सिखने सिखाने के क्रम में ऐसी जानकारी मंच को देना मैं अपना फ़र्ज़ समझता हूँ सिर्फ़ इसी लिये लिख दिया था ।
Comment by khursheed khairadi on July 13, 2017 at 7:14am
सभी आदरणीय रचनाकारों का हृदय से आभार। आदरणीय समर सर, हिंदी और उर्दू हिन्दुस्थान की मिट्टी में जायी-जन्मी सगी बहनें हैं। इनके मूल संस्कृत-फारसी शब्दों से इन भाषाओँ के शब्दों का उच्चारण हिंदुस्थानी में अलग हो जाता है। जैसे कोई कहे पत्ता किन्तु मूल शब्द पत्र होता है। मेरे पास तो मुहम्मद मुस्तफ़ा खान मद्दाह का उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान का शब्दकोष है। वहाँ काफ़िर ही है, नीचे नोट दिया है कि फ़ारसी वाले काफ़र लिखते हैं। अब मैं तो हिंदुस्थानी हूँ, फ़ारसी तो नहीं। मेरी ग़ज़ल हिंदुस्थानी ज़बान (ज़ुबान, भी सही है) की ग़ज़ल है, फ़ारसी की नहीं। और में तो उर्दू भी नहीं जानता हूँ। इसलिए आपके फ़ारसी शब्दकोष के मानक पर नहीं चल पाने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।
सादर।
Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 7:47pm

आ. ख़ुर्शीद जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही आपने. सभी शेर ख़ूबसूरत हैं. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 11, 2017 at 11:03pm
आ.खुर्शीद जी ईस बेहतरीन गजल के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 11, 2017 at 9:00pm

जानदार शानदार , आदरणीय

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