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1222 1222 1222 1222


कभी चंदा, कभी सूरज,कभी तारे संभाले हैं
सुखनवर के नसीबो में मगर पांवों के छाले हैं

हमारी बेगुनाही का यकीं उनको हुआ ऐसे
वो जिनको चाहते हैं अब उन्हीं के होने वाले हैं

मेरी भूखी निगाहों में शराफत ढूंढने वाले
तेरी सोने की थाली में मेरे हक़ के निवाले हैं

हमारी झोपडी का कद बहुत ऊंचा नहीं लेकिन
तेरे महलों के सब किस्से हमारे देखे भाले हैं

भरी महफ़िल में आके पूछते हैं हाल मेरा वो
तकल्लुफ भी निराला है,इरादे भी निराले हैं

चलो अब इस जहाँ की सोच से नज़रे हटा लें हम
जहाँ तक देखते हैं ,हर किसी के हाथ काले हैं

डुबाकर मेरे ख़्वाबों का सफीना पार उतरो तुम
तेरे अहसास की सपने तो लहरों के हवाले हैं

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on April 16, 2017 at 10:52am
बहुत बहुत आभार
शुक्रिया
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी
आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी
आदरणीय बृजेश कुमार जी
सादर
Comment by मनोज अहसास on April 16, 2017 at 10:48am
आदरणीया राजेश कुमारी जी
सादर नमन
बहुत बहुत शुक्रिया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 5, 2017 at 6:58pm

वाह वाह मनोज कुमार एहसास जी,बहुत अच्छे अशआर हुए हैं जिसके लिए दिल से बधाई लीजिये 

मेरी भूखी निगाहों में शराफत ढूंढने वाले
तेरी सोने की थाली में मेरे हक़ के निवाले हैं-----बहुत ही उम्दा शेर

सुखनवर के नसीबो में मगर पांवों के छाले हैं--सुखनवर के मुकद्दर  में फकत  पांवों के छाले हैं---समर भाई जी ने बहुत उम्दा इस्स्लाह दी है 

हमारी बेगुनाही का यकीं उनको हुआ ऐसे

वो जिनको चाहते हैं अब उन्हीं के होने वाले हैं---ये शेर कुछ उलझा हुआ है बात स्पष्ट नहीं है 

अंतिम शेर के विषय में आदरणीय समर भाई जी से सहमत हूँ जरा से फेर बदल से शुतुर्गुर्बा दोष खत्म हो जाएगा 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 5, 2017 at 6:30pm

आदरनीय मनोज भाई , बहुत अच्छी गज़ल कही आपने , कुछ शेर बहुत पसंद आये , दिल से बधाइयाँ प्रेषित है ... स्वीकार कीजिये । चर्चा भी सार्थक हुआ ... जिससे मंच लाभांन्वित हुआ ।  सभी का आभार ।

Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2017 at 5:02am
आदरणीय मनोज जी सादर अभिवादन , बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने इस शानदार ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ..बड़ों की इस्लाह से काफी कुछ सीखने को मिला..
Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2017 at 5:02am
आदरणीय मनोज जी सादर अभिवादन , बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने इस शानदार ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ..बड़ों की इस्लाह से काफी कुछ सीखने को मिला..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 3, 2017 at 10:51pm
आदरणीय मनोज भाई बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने इस शानदार ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ..बड़ों की इस्लाह से काफी कुछ सीखने को मिला..
Comment by Samar kabeer on April 2, 2017 at 10:50pm
//सुखनवर के मगर हिस्से में बस पांवों के छाले हैं//

"सुख़नवर के मुक़द्दर में फ़क़त पैरों के छाले हैं"

ये कैसा रहेगा निलेश जी ?
Comment by मनोज अहसास on April 2, 2017 at 10:14pm
बहुत बहुत शुक्रिया
आदरणीय नीलेश जी
मेरी खुशनसीबी कि आज आदरणीय समर कबीर सर
के साथ साथ कई वरिष्ठ लोगों का मार्गदर्शन मिला और
आप भी ग़ज़ल पर आये
ये ग़ज़ल एक फंसी हुई ग़ज़ल थी कई हफ्ते लग गए फिर भी उतना नहीं सुलझा पाया जितना सुलझाना चाहता था
आज बस पोस्ट कर ही दी
सभी का मार्गदर्शन मिल जाये तो फिर पुनः इस पर थोड़ा काम और किया जाये ऐसा सोच रहा हूँ
बहुत बहुत आभार
सादर
Comment by मनोज अहसास on April 2, 2017 at 9:55pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय अनुराग जी
मेरे भावों तक आप पहुचे इसके लिए बहुत आभार
आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा
ऐसी आशा है
सादर

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