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पढ़ सके तू जो अगर - ग़ज़ल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2122    1122    1122    22

खूब परहेज भी करता है दिखाने के लिए
है जरूरत भी मगर प्यार जमाने के लिए /1

सोच मत सिर्फ  बहाना है बहाने के लिए
वक्त है पास कहाँ तुझको मनाने के लिए /2

शौक पाला जो सितम हमने उठाने के लिए
आ गई  धूप  भी  राहों  में सताने के लिए /3

देख हालात को खुद ही तू  जगा ले अब तो
कौन  आएगा  तुझे  और  जगाने  के लिए /4

पढ़ सके तू जो अगर रोज किताबों सा पढ़
है नहीं  बात कोई  मुझ में छुपाने के लिए /5

कैसी किस्मत थी कि आखिर वो मरा भी बेघर
खूब बेघर  जो  रहा घर  को  बनाने के लिए /6

मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2016 at 12:10am

आ भाई जेनिट जी हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2016 at 12:09am

आ० भाई हरी प्रकाश जी प्रशंसा के लिए आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2016 at 12:08am

आ०  भाई रवि शुक्ल जी उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 2, 2016 at 6:20pm
सुन्दर ग़ज़ल कही आपने आदरणीय लक्ष्मण जी..
Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 2:03am

पढ़ सके तू जो अगर रोज किताबों सा पढ़
है नहीं  बात कोई  मुझ में छुपाने के लिए....सुन्दर रचना ,हार्दिक बधाई आ.लक्ष्मण धामी जी ! सादर 

Comment by Ravi Shukla on February 1, 2016 at 1:30pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बढि़या गजल के लिये दाद कुबूल करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2016 at 6:35pm

आ भाई सुशील जी ,उत्साहवर्धन के लिए आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2016 at 6:34pm

आ० भाई तेजवीर जी प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2016 at 6:34pm

आ० भाई समर कबीर जी ,उपस्थिति प्रशंसा और बेहतरीन सलाह देने के लिए आभार l

Comment by Sushil Sarna on January 29, 2016 at 9:09pm

शौक पाला जो सितम हमने उठाने के लिए
आ गई धूप भी राहों में सताने के लिए /3

वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी वाह .... बेहद खूबसूरत अहसास पिरोये हैं आपने अपनी इस दिलकश ग़ज़ल में। दिल से बधाई स्वीकार करें सर।

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