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बिस्तर पर सिलवटें

सुबह शाम

दफ्तर काम

ढलता सूरज

उगता चाँद

रात, तुम्हारी याद

आखों से बरसात !!

कभी भूख

कभी प्यास

कभी हर्ष

कभी विषाद

तन्हाई, रात वीरान

सुलगते हुए अरमान !!

तन्हा सफर

स्ट्रीट लाईट

पाखी जलता

मन मचलता

प्यास, बैचैन करवटें

बिस्तर पर सिलवटें !!

उगता सूरज

आँखें लाल

वही सवाल

वही मदहोशी

गुम, खुद में कहीं

नहीं सुध किसी चीज़ की !!

फिर वही

सिलसिला

सुबह शाम

दफ्तर काम

ढलता सूरज

उगता चाँद

रात, तुम्हारी याद

आखों से बरसात !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

 

 

 

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 16, 2015 at 7:30pm

आदरणीय इंजी.गणेश जी “बागी” सर , रचना को स्वीकृति प्रदान करने एवं मान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर। 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 15, 2015 at 11:44am

वाकई कुछ अलग सा प्रयोग करना चाह रहा था , सोमेश भाई आपका समर्थन मिला आभार एवम् आपकी  उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका  हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ  ! 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 15, 2015 at 11:28am

आदरणीय  जितेन्द्र पस्टारिया साहब , रचना पर सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 15, 2015 at 11:23am

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर ,  प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार ! सादर

 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 13, 2015 at 3:40pm

आदरणीय हरी जी ..बहुत ही सुंदर तरीके से आपने वर्तुमान परिदृश्य में चल रही इंसानी ज़िंदगी का बखूबी चित्रण किया है इसके लिए आपको ढेर सारी बधाई सादर 

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on February 13, 2015 at 1:46pm

sundar rachnaa  - badhaee mitra

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 12, 2015 at 11:41am

हरि प्रकाश जी

सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई  i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 12, 2015 at 10:44am

आज के जीवन में यंत्रवत सी हुई जिन्दगी उस पर एकाकीपन ...सुन्दरता से मन के भावों को शब्दबद्ध किया है आपने बहुत- बहुत बधाई हरि प्रकाश दूबे जी 

Comment by khursheed khairadi on February 12, 2015 at 12:55am

तन्हा सफर

स्ट्रीट लाईट

पाखी जलता

मन मचलता

प्यास, बैचैन करवटें

बिस्तर पर सिलवटें !!

आदरणीय हरिप्रकाश सर सुन्दर  ..अति सुन्दर हर पंक्ति दूसरी के साथ ध्वनित होकर विशिष्ट लय बुन रही है |

फिर वही

सिलसिला

सुबह शाम

दफ्तर काम

ढलता सूरज

उगता चाँद

हार्दिक बधाई |सादर अभिनन्दन| 

Comment by Sushil Sarna on February 10, 2015 at 4:07pm

उगता सूरज
आँखें लाल
वही सवाल
वही मदहोशी
गुम, खुद में कहीं
नहीं सुध किसी चीज़ की !!

शानदार शानदार और शानदार आदरणीय … हार्दिक बधाई।

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