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भंग न तुम्हारा मौन हुआ

तुम साहसी हो,

मैं यह मानकर चला,

इसी  भाव  को,

हृदय में धारण कर,

प्रेम पथ पर आगे बढ़ा,

भावी जीवन का स्वप्न सजोयें,

परिवार, समाज, दुनिया से लड़ा,

पर देखो आज शर्मिन्दा खड़ा हूँ ,

स्वयं की नजरों में गिरा पड़ा हूँ ,

मुझे प्यार किया तुमने, पर कह ना सकीं,

मेरा जीवन होम हुआ, पर भंग न तुम्हारा मौन हुआ !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

Views: 762

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 7:06pm

आदरणीय मोहन सेठी जी,हार्दिक आभार आपका ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 7:03pm

आदरणीय उमेश कटारा जी, प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 1:31pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , रचना की सराहना करने के लिए आपका ह्रदय तल से आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 1:30pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर ,आपका आशीर्वाद मिल गया ,रचना सार्थक हुई ! सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 1:26pm

आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी, उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु  आपका हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 1:21pm

आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया साहब ,आपकी उत्साहवर्धक सराहना के लिए, आपका बहुत-बहुत आभार ,सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 1:19pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर , प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 17, 2015 at 1:09pm

आदरणीय इंजी.गणेश जी “बागी” सर , रचना को स्वीकृति प्रदान करने एवं मान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।

 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 16, 2015 at 11:54am

वाह! बहुत सुंदर. छोटी किन्तु प्राभावशील रचना, बधाई आदरणीय हरिप्रकाश जी

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on February 16, 2015 at 6:41am

कभी कभी हर साहस समाज के दबाव में हल्का पड़ जाता है ....सुंदर भाव 

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