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दोहा त्रयी. . . मैं क्या जानूं

दोहा त्रयी :मैं क्या जानूं 

मैं क्या जानूं आज का, कल क्या होगा रूप ।
सुख की होगी छाँव या , दुख की  होगी  धूप ।।

मैं क्या जानूं भोर का, होगा  क्या  अंजाम।
दिन बीतेगा किस तरह , कैसी होगी शाम ।।

मैं  क्या  जानूं  जिन्दगी, क्या  खेलेगी  खेल ।
उड़ जाए कब तोड़ कर , पंछी तन की जेल ।।


सुशील सरना / 17-11-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on November 29, 2022 at 3:11pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Sushil Sarna on November 29, 2022 at 3:11pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सहमत एवं संशोधित । हार्दिक आभार सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2022 at 7:11am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छे दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई। आ. भाई समर जी की बात से सहमत हूँ देखिएगा। 

Comment by Samar kabeer on November 27, 2022 at 2:42pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छे दोहे हुए हैं, बधाई स्वीकार करें I 

'मैं क्या जानूं भोर की, होगा  क्या  अंजाम' इस पंक्ति में 'की' की जगह "का" होना चाहिए ,क्यों कि 'अंजाम' शब्द पुल्लिंग है I 

कुछ टंकण त्रुटियाँ देख लें I 

Comment by Sushil Sarna on November 24, 2022 at 5:26pm
आदरणीया डा. प्राची सिंह जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 21, 2022 at 5:57pm

मैं क्या जानूं आज का, कल क्या होगा रूप ।
सुख की होगी छाँव या , दुख की  होगी  धूप ।।

"गत आगत में प्रेम का, है अद्भुत सम्बन्ध 
मन में रोंपे पुष्प जो, होगी वह ही गंध"

मैं क्या जानूं भोर की, होगा  क्या  अंजाम।
दिन बीतेगा किस तरह , कैसी होगी शाम ।।

"क्या होगा किस पल घटित, छोड़े इसका ध्यान 
इस पल में जो व्याप्त है, रहे उसी का भान"

मैं  क्या  जानूं  जिन्दगी, क्या  खेलेगी  खेल ।
उड़ जाए कब तोड़ कर , पंछी तन की जेल ।।

"उड़ जाएगा हंस जब, रह जाएगा खोल 
मोल हंस का जान लें, बाकी सब बेमोल"

बहुत सुन्दर विचार प्रधान दोहे हुए हैं आदरणीय सुशील सरना जी 
बहुत बहुत बधाई स्वीकारें 

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