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2122 2122 2122 212

ज़ख्म मेरे जब कभी तुम पर बयाँ हो जाएंगे 

सामने के सब नज़ारे बेजुबाँ  हो जाएंगे 

हाथ में  पत्थर नहीं कुछ ख्वाब दो कुछ काम दो 

हाथ ये नापाक के  कठपुतलियाँ हो जाएंगे 

खेलने दो आज इनको फ़िक्र सारी छोड़कर 

ज़िन्दगी उलझा ही देगी जब जवाँ हो जायेंगे 

जब कभी अफवाह उठ्ठे तुम यकीं करना नहीं 

झूठ की इस आग में ही घर धुवां हो जायेंगे 

ये सफर तन्हा नहीं है साथ गम यादें तेरी 

गम तुम्हारे मिल गये अब कारवां हो जायेंगे

हो गए कुछ शेर भी गर हर जुबाँ पर दर्ज तो 

नाम अपने इस जहां में जाविदाँ हो जायेंगे 

तीरगी को ओढना क्या इस जहां से राज क्यों 

इस तरह गुमनाम हम तो दास्ताँ हो जायेंगे 

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथोरागढ़ी 

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Comment by gumnaam pithoragarhi on August 2, 2018 at 5:47am

शुक्रिया लक्ष्मण भाई जी ... .समर साहब आपके सुझाव का शुक्रिया .. .. अच्छा लगा बसंत जी आपको ग़ज़ल अच्छी लगी शुक्रिया..   

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 1, 2018 at 9:09pm

आ. भाई गुमनाम जी, बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on August 1, 2018 at 6:00pm

जनाब गुमनाम पिथोरागढ़ी जी आदाब, ओबीओ के तरही मिसरे पर बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

ज़ख्म मेरे जब कभी तुम पर बयाँ हो जाएंगे '

मतले के इस मिसरे में 'बयाँ' की जगह "अयाँ" क़ाफ़िया उचित होगा,देखियेगा ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 1, 2018 at 12:43pm

बहुत सुंदर गजल हुई है आदरणीय , बहुत बहटा बधाई आपको

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 31, 2018 at 10:18pm

शुक्रिया नवीन जी शुक्रिया तेज वीर जी ... .. आपकी समलोचनाओ का स्वागत. ..  .. 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 31, 2018 at 8:47pm

हार्दिक बधाई आदरणीय गुमनाम जी।बेहतरीन गज़ल।

खेलने दो आज इनको फ़िक्र सारी छोड़कर 

ज़िन्दगी उलझा ही देगी जब जवाँ हो जायेंगे 

Comment by Naveen Mani Tripathi on July 31, 2018 at 8:26pm

आ0    साहब बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई । मझे हर शेर अच्छे लगे । बाकी गुण दोष ग़ज़ल के विद्वान् देझेंगे । मेरी ओर से हार्दिक बधाई । 

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