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पर्यावरण

प्रकृति का संगीत है पर्यावरण ,
वनसम्पदा का प्रतीक पर्यावरण |
कोयल की कूक,पंछी की चहक,
फूलो की महक,झरनों की छलक ,
रंगीं धरती का गीत है पर्यावरण |
प्रदूष्ण ने फैलाया है जाल ,
लिपटी धरा उसमें है आज
बचाना है धरती का आवरण |
कटे पेड़ों से बिगड़ा आकार ,
चहुँ ओर फैला है हाहाकार ,
टूटें तार ,सुना है पर्यावरण |
आओ मिल लगायें नये पेड़ पौधे ,
सूनी धरा में खुशियाँ नई बो दे ,
नये स्वर बनाएं रंगीं पर्यावरण |

Added by Rekha Joshi on May 12, 2012 at 10:00pm — 24 Comments

" तब और अब "

पहले हँसता था
खुश था
पर लोग दुखी थे
सो करते थे दुखी
अब एक उदासी ओढ़ ली है
और
चुप रहता हूँ
चिपका लिया है दुःख का मुखौटा
पर
अब लोग खुश हैं
दुःख को देख कर
और मैं उनको सुखी देख कर
खुश हूँ 
फर्क इतना है...
पहले अपने ही में खुश था
अब जान लिया है लोगों की ख़ुशी…
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Added by AjAy Kumar Bohat on May 12, 2012 at 8:00pm — 10 Comments

" सिगरेट "

मैं एक जिस्म हूँ
सिर्फ 
एक ठंडा जिस्म
और मेरा
ठंडा बेजान जिस्म
पड़ा है लावारिस
कई जगहों पर
रास्तों में, फुटपाथ पर, कूड़े के ढेर पर,
बसों में, रेलवे-प्लेटफार्म पर 
लोगों की ठोकरों में,
पैरों में आता हुआ
या फिर
मिल जाउंगी सुलगती..
ऐश-ट्रे में
जो सजी है मेज पर
और ... मेज
घर की…
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Added by AjAy Kumar Bohat on May 12, 2012 at 7:44pm — 8 Comments

गुफ्तगू माँ से (मदर्स डे पर )

माँ 
ये कौन सी  सफलता है 
ये कैसा लक्ष्य है
जो ले आया है
तुमसे दूर 
बहुत दूर
ये कैसी तलाश है
कैसा सफ़र है
की मैं चल पड़ी हूँ 
अकेले ही
तुम्हे छोड़ कर
ये कैसी जिद है मेरी
ठुकरा कर छत्र छाया तेरी
निकल पड़ी हूँ
कड़ी धूप में झुलसने…
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Added by MAHIMA SHREE on May 12, 2012 at 6:30pm — 26 Comments

उदास नहीं देख सकता

स्याह रातों में चाँद का गिलास नहीं देख सकता

उखड़ी उखड़ी आवाज़ तेरी, बोझल सांस नहीं देख सकता

.

तेरे माथे पर कोई दोष न होगा कभी ,

तुझे मजबूर, बद -हवास नहीं देख सकता

.

हाँ , तेरी रुसवाई तो फिर भी सह लूँगा ,

तुझे खुद से नाराज़, उदास नहीं देख सकता

.

मेरी रूह में घुल गयी है मधु तेरी रहमत की

क्या हुआ कि रहूँ तनहा, तुझे आस पास नहीं देख सकता

.

हैं अजीब हालात, मगर तेरे कदम न रुकें

तुझे बिखरा हुआ सा, उजास…

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Added by Nilansh on May 12, 2012 at 3:30pm — 13 Comments

जुदा सारे जहां से गाँव अब भी गाँव है

हमारी फिक्र थी ये गाँव अब भी गाँव है

सियासत के करम से गाँव अब भी गाँव है



मखमली सेज सूखी घास से देखो बनी

महल सी झोपड़ी में गाँव अब भी गाँव है



मिलेगी छाँव बरगद नीम पीपल की घनी

मिटे हर पीर जाके गाँव अब भी गाँव है



ख़ुशी हर चेहरे में औ दर्द दिल में दफ़न

रंज औ गम भुलाके गाँव अब भी गाँव है



सखी ऐसे तके है राह हाये प्रियतम की

बिछाये चश्म अपने गाँव अब भी गाँव है…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 12, 2012 at 1:44pm — 10 Comments

मैं गंगा हूँ

मानसरोवर से मैं  निकली गंगोत्री  मेरा धाम 
पाप धोएं पापी मुझमे फिर भी मैं निष्काम
प्रयास भगीरथ करके लाये  धरा   निज  धाम 
साठ सहस्त्र पुरखे तारे  कहाँ  मोहे   विश्राम 
चली नगर जब  भर   डगर  बंजर उपजाऊ   हो  गए
छा गयी हरियाली जग में प्यासे मन   हर्षित   हो गये
माँ कहके जन पुकारे…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 12, 2012 at 1:30pm — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हाँ मैं कमजोर हूँ माँ हूँ ना!!!

कितना जोश और ख़ुशी 

थी तुम्हारी आवाज में 

जब तुमने मुझे फोन पर बताया 

की माँ तुम्हारे दामाद ने 

आज पांच आतंकवादियों 

को मार गिराया 

तुम लगातार ख़ुशी से बता 

रही थी और मेरा मन 

कंहीं दूर किसी धुंधलके 

की तरफ खिंचता जा रहा था 

तुम्हारी आवाज दूर होती जा रही थी 

कुछ क्षण बाद वापस आती हूँ तो सोचती हूँ 

की तुम कितनी बहादुर हो 

बिलकुल अपने 

जांबाज पति की तरह 

मुझे गर्व है तुमपर 

मेरी…

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Added by rajesh kumari on May 12, 2012 at 12:47pm — 5 Comments

‎" ए.सी. और प्राइवेसी "

हे ईश्वर 

यह सच है की,

मैंने चाहा 'ए.सी' 

ये भी सच

मैंने माँगी 

'प्राइवेसी' 

हे अंतर्यामी 

रही चाहत मेरी सदैव 

रहूँ मैं लाईम-लाईट में

और

टिका रहे हर वक़्त मुझ पर ही कैमरा

आती रहे निरंतर कानो में

हरे-हरे नोटों के

फड़फड़ाने की आवाज़...

लेकिन

मेरी मुद्दत की तमन्नाओं का

ये क्या तर्जुमा.... मेरे परवरदिगार

आज खड़ा हूँ मैं बन कर

ATM का चौकीदार !!!



~…

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Added by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 9:59pm — 6 Comments

ज़माने को रुला जाते

तुम्हारे दिल में बस जाते, अगर तुम रास्ता देते....
तबाह-ए-ख़ाक हो जाते, अगर तुम वास्ता देते ....
दिल को एहसास ही रहा, मगर तेरे ना हुए हम....
ज़माने को रुला जाते, अगर हम दास्ताँ कहते ....


Added by Shayar Raj Bajpai on May 11, 2012 at 8:00pm — 5 Comments

उसी फानूस ने ही दीप ये बुझाया दोस्तों

मनाने का हुनर हमको कभी न आया दोस्तों

बड़ी मगरूर थी वो मैं समझ न पाया दोस्तों

दिखे नादान सा लेकिन खबर सभी की है उसे

जिसे सबने सता के आदमी बनाया दोस्तों



गर्दिशों से मिटा जिसके ख्वाब महलों के रहे

  उजालों की ख्वाहिस में झोपड़ी जलाया दोस्तों



बुरा कितना रहा हो आदमी जमाने में मगर

जनाजा चार कांधो ने वही उठाया दोस्तों



तडपता वो रहा जिसके लिये जिगर को थाम…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 11, 2012 at 7:30pm — 10 Comments

दस हाइकु

हाइकु...

१..

बचपन में

सहारा लगता है

पचपन में

. ----

२.

अदालत है

देखो फंस ना जाना

पुलिस-थाना..

 -----

३.

साँझ ने घेरा

गहरा है अँधेरा

कहाँ सबेरा...

४.

अदावत में

बच नहीं पावोगे

अदालत में .

५.

यह तस्वीर

हैं रंग कैसे- कैसे

ये तकदीर ..

६..

धर्म अपना

ईमान भी अपना

कर्म अपना.

७..

कर्ज में डूबे

बढ़े बचाने हाँथ

फ़र्ज़ में डूबे.

८.

देश…

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Added by AVINASH S BAGDE on May 11, 2012 at 4:30pm — 8 Comments

~ कविता के पंछी या पंछियों की कविता ~

थिरक-थिरक
नाचता   मोर ... फिर 
देख  कर
पाँव अपने
हो जाता बोर
---
कुहू कुहू गाती कोयल
मन को मनभाती कोयल
पराये घोंसले में देकर अंडे
कहाँ जाने फुर्र हो जाती कोयल 

© AjAy Kum@r

Added by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 11:56am — 6 Comments

भीड़...अजय कुमार बहोत

मैं
भीड़ हूँ
इस लोकतंत्र के ढाँचे की मैं रीढ़ हूँ
जी हाँ
मैं भीड़ हूँ...

तिनका-तिनका जोड़ता दिन का
रोज़ बिखरता-जुड़ता
मन-आशाओं का नीड़ हूँ
मैं भीड़ हूँ...

कहाँ फुर्सत
वैष्णव-जन को,
की जाने मुझ को
एक परायी पीड़ हूँ
मैं भीड़ हूँ...

~ © AjAy Kum@r

Added by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 11:30am — 10 Comments

तुम्हारा मौन

तुम्हारा मौन
विचलित कर देता है
मेरे मन को
सुनना चाहती हूँ तुम्हे
और
मुखर हो जाती हैं
दीवारें , कुर्सियां
टेबल , चम्मचे
दरवाजे
सभी तो कहने लगते हैं
सिवाए तुम्हारे

Added by MAHIMA SHREE on May 10, 2012 at 4:15pm — 17 Comments

भीड़...महिमा श्री

हां भीड़ में शामिल
मैं भी तो हूँ
रोज
अलसुबह उठ के
जाती हूँ
शाम को आती हूँ
दूर से देखती हूँ
कहती हूँ
ओह देखो तो जरा
कितनी भीड़ है
और फिर
मैं भी भीड़ हो जाती हूँ

Added by MAHIMA SHREE on May 10, 2012 at 4:00pm — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
माँ तुम्हें कहाँ से लाऊं ???

वो छोटी सी पगडण्डी 
जिसकी नुकीली झाड़ियाँ 
अपने हाथों से काटकर 
बनाई थी तुमने मेरे चलने के लिए, 
आज वो कंक्रीट की सड़क बन गई है 
जो पौधा अपने आँगन 
में लगाया था तुमने, 
वो सघन दरख़्त बन गया है 
नई- नई कोंपले 
भी निकल आई हैं उसपर 
जो नन्हा दिया जलाया 
था तुमने मुझे रौशनी देने के लिए 
वो अब आफताब बन गया है 
तुम्हारे उस कच्ची माटी के…
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Added by rajesh kumari on May 10, 2012 at 1:45pm — 17 Comments

उड़ान

यह रचना मैंने करीब १०-११ साल  पहले लिखी थी और आज जब इस रचना को पढ़ती हूँ तो ऐसा लगता है मानो न तब कुछ बदला था न आज कुछ बदला है बस अगर कुछ बदला है तो इस पुरुष प्रधान समाज में तीर मारने वाले बदल गए है. ये रचना हमेशा मेरे मन के निकट रही है इसलिए आप सभी तक पहुंचा रही हूँ ----
"उड़ान"

मैं हूँ इक छोटी सी…
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Added by Monika Jain on May 9, 2012 at 12:30am — 12 Comments

वही तो सृजनकार है....

जिसका अंक है कोई, न रूप कार है,

जो प्रकाश पुंज है, जो निर्विकार है,

कणों कणों से एक सुर में ये पुकार है,

वही तो सृनकार है, वही तो सृनकार है।



ये नगर ये…

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Added by इमरान खान on May 8, 2012 at 1:00pm — 8 Comments

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