For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

यह रचना मैंने करीब १०-११ साल  पहले लिखी थी और आज जब इस रचना को पढ़ती हूँ तो ऐसा लगता है मानो न तब कुछ बदला था न आज कुछ बदला है बस अगर कुछ बदला है तो इस पुरुष प्रधान समाज में तीर मारने वाले बदल गए है. ये रचना हमेशा मेरे मन के निकट रही है इसलिए आप सभी तक पहुंचा रही हूँ ----
"उड़ान"
मैं हूँ इक छोटी सी चिड़िया
मन चाहे इस खुले गगन में
जी भर ऊँची भरू उड़ान .
पर जब भी मन की आशा को
स्वयं सार्थक करती हूँ,
तभी अचानक कंही दूर से
एक भयंकर तूफां आकर
मेरे कोमल पंखों को
ज़हर भरा एक तीर मार कर
मुझको घायल कर जाता है.
देख के मैं अपने पंखों को
आहत हो बेबस रह जाती.
पर कुछ थोड़े समय बाद ही
नए जोश और उम्मीदों से 
इन पंखों को पुनः जोड़ती,
फिर मन को विश्वास दिलाती ,
और पुनः ये ख्वाहिश करती
इस सुन्दर से नील गगन में
जी भर ऊँची भरूं उड़ान .......
मोनिका जैन "dolly"

Views: 963

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Rekha Joshi on May 20, 2012 at 2:41pm

देख के मैं अपने पंखों को 
आहत हो बेबस रह जाती.
पर कुछ थोड़े समय बाद ही
नए जोश और उम्मीदों से  
इन पंखों को पुनः जोड़ती,
फिर मन को विश्वास दिलाती ,आशा और उम्मीद पर जिंदगी टिकी हुई है ,बहुत बढ़िया बधाई |

Comment by Nilansh on May 12, 2012 at 11:40am

v nice

Comment by Roshni Dhir on May 11, 2012 at 9:08pm

Monika ji... apki kavita me jo ashawadi soch hai woh bahut sunder hai........

sunder bahvon ke liye badhai 

abhar 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 11, 2012 at 8:41pm

मोनिका जी, समय के साथ अनेकों भाव आते हैं और जाते हैं , उन्ही भावों को आप सहेजने का प्रयास की है , बधाई आपको |

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 7:20pm

कुछ थोड़े समय बाद ही
नए जोश और उम्मीदों से  
इन पंखों को पुनः जोड़ती,

फिर मन को विश्वास दिलाती ,
और पुनः ये ख्वाहिश करती 
इस सुन्दर से नील गगन में 
जी भर ऊँची भरूं उड़ान ....

Bahut hi sundar bhaav hai...

Comment by Bhawesh Rajpal on May 11, 2012 at 4:18pm

देख के मैं अपने पंखों को आहत हो बेबस रह जाती. पर कुछ थोड़े समय बाद ही नए जोश और उम्मीदों से  इन पंखों को पुनः जोड़ती, फिर मन को विश्वास दिलाती , और पुनः ये ख्वाहिश करती इस सुन्दर से नील गगन में जी भर ऊँची भरूं उड़ान .......  

जीवन को नए सिरे से जीने की आशा जगती ये पंक्तियाँ  निराश मन में नई उमंग जगा जाती हैं

बहुत-बहुत बधाई  आपको मोनिका जी  !

Comment by आशीष यादव on May 11, 2012 at 2:55pm

रचना बेशक पुरानी है लेकिन तासीर नई सी लगती है।
बधाई

Comment by Monika Jain on May 10, 2012 at 12:49am

Aap sabhi ko hardik dhanyavaad. aur han Prachi ji apni kavita zarur yaha post kriye.

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 9, 2012 at 9:45pm

मोनिका जी,
               पर कुछ थोड़े समय बाद ही
        नए जोश और उम्मीदों से 
        इन पंखों को पुनः जोड़ती,
              फिर मन को विश्वास दिलाती ,
              और पुनः ये ख्वाहिश करती
        इस सुन्दर से नील गगन में
        जी भर ऊँची भरूं उड़ान .......
 बहुत सुन्दर उम्मीद जगाती रचना. बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 9, 2012 at 5:38pm

मोनिका जी आपकी यह कविता बहुत कुछ कह रही है पंख टूटना उनको जोड़ कर फिर प्रयास करना फिर पंखों का टूट जाना यही सब तो होता आया है एक नारी की जिंदगी में बाकी सब कुछ प्राची जी ने कह दिया .आपको बधाई इस सुन्दर रचना के लिए 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
20 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Saturday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Jul 14
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service