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ग़ज़ल दिनेश कुमार -- अंधेरा चार सू फैला दमे-सहर कैसा

1212-- 1122-- 1212-- 22

अंधेरा चार सू फैला दमे-सहर कैसा

परिंदे नीड़ में सहमे हैं, जाने डर कैसा

ख़ुद अपने घर में ही हव्वा की जात सहमी है 

उभर के आया है आदम में जानवर कैसा

अधूरे ख़्वाब की सिसकी या फ़िक्र फ़रदा की

हमारे ज़हन में ये शोर रात-भर कैसा

सरों से शर्मो हया का सरक गया आंचल 

ये बेटियों पे हुआ मग़रिबी असर कैसा

वो ख़ुद-परस्त था, पीरी में आ के समझा है 

जफ़ा के पेड़ पे रिश्तों का अब समर कैसा

दिनेश कुमार 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on May 22, 2025 at 6:02pm

बहुत खूब, आदरणीय दिनेश कुमार जी. वाह वाह 

इस अच्छे प्रयास पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें 

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 5, 2025 at 12:15pm

वाह-वह और वाह भाई दिनेश जी....बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है बधाई.... 

Comment by दिनेश कुमार on March 9, 2024 at 8:35am

बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय समर साहब। ठीक करता हूं। 

देर से रिप्लाई के लिए माफ़ कीजिएगा।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 1, 2024 at 9:05am

आ. भाई दिनेश जी, अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on December 19, 2023 at 3:22pm

जनाब दिनेश कुमार जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I 

'परिंदे नीड़ में सहमे हैं, जाने डर कैसा'

इस मिसरे को उचित लगे तो यूँ कहें :-

'परिंदे सहमे हुए हैं है उनको डर  कैसा'

'ख़ुद अपने घर में ही हव्वा की जात सहमी है'

इस मिसरे में 'ज़ात' शब्द उचित नहीं लगता. इसकी जगह "बेटी" शब्द ठीक रहेगा ग़ौर करें I 

कुछ टंकण त्रुटियाँ देखें :-

अँधेरा 

दम-ए-

ज़ह्न 

शर्म-ओ-

आँचल  

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 15, 2023 at 1:18am

बहुत सुन्दर प्रस्तुति , आदरणीय दिनेश कुमार जी , बधाई। सादर।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 5, 2023 at 9:17pm

सुनन्दरम।

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 4, 2023 at 12:21pm

वाह दिनेश जी वाह बहुत ही सुन्दर रचना 

कृपया ध्यान दे...

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