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ग़ज़ल - दर-दर फिरते लोगों को : सलीम रज़ा रीवा

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.

दर-दर फिरते लोगों को दर दे मौला :
बंजारों को  भी अपना घर  दे  मौला :

जोऔरों की खुशियों  में खुश होते  हैं :
उनका भी घर खुशियों से भर दे मौला :

दूर गगन में उड़ना चाहूँ   चिड़ियों सा :
मुझ को भी वो ताक़त वो पर दे मौला :

ज़ुल्मो सितम हो ख़त्म न हो दहशतगर्दी :
अम्नो अमां की यूं बारिश  कर  दे मौला :

भूके प्यासे मुफ़लिस और  यतीम हैं जो :
नज़्र-ए-इनायत उनपर भी कर दे मौला :


जो करते हैं खून ख़राबा  जुल्मो सितम :
उन  के भी दिल में थोडा डर दे मौला :
----------------------------------------
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on January 24, 2016 at 8:27pm
जनाब समर साहब इनायत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.
Comment by Samar kabeer on January 24, 2016 at 5:58pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,पहली बार आपकी ग़ज़ल से रु ब रू हुआ हूँ,बहुत अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ आपने मंच को,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं |
चश्म-ए-इनायत और नज़्र-ए-इनायत एक ही बात है,जैसे"चश्म-ए-बद दूर और नज़्र-ए-बद दूर एक ही है,"चश्म"यानी आँख "नज़र"यानी निगाह,बीनाई,देखियेगा|
Comment by SALIM RAZA REWA on January 23, 2016 at 7:00pm

आदरणीय ,तेज वीर सिंह * साहब कलाम पसंद आया इसके लिए दिली शुक्रिया ,
उम्मीद है आपकी दुआओं का साया मेरे सर पर हमेशा क़ाइम रहेगा !

Comment by TEJ VEER SINGH on January 23, 2016 at 5:48pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सलीम रज़ा साहब जी!बेहतरीन गज़ल!खुदा करे गज़ल में की गयी सभी दुआयें कुबूल हो जांयें!

Comment by SALIM RAZA REWA on January 23, 2016 at 5:47pm

आदरणीय शुक्ला जी

आपकी दुआओं के लिए बारहा  दिली  शुक्रिया.

Comment by Ravi Shukla on January 23, 2016 at 5:23pm
आदरणीय सलीम रज़ा जी बहुत बहुत आभार आपका इनायत को और भी विस्तृत रूप में लिया हैं आपने ये जान कर सोच को एक और दिशा मिली । आपका धन्यवाद
Comment by SALIM RAZA REWA on January 23, 2016 at 12:34pm
जनाब उस्मानी साहब,
आपकी दुआओं के लिए तहे दिल से शुक्रिया .
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 23, 2016 at 12:03pm
तहे दिल दुआओं से भरी बेहतरीन ग़ज़ल के लिए तहे दिल बहुत बहुत मुबारकबाद आपको जनाब सलीम रज़ा साहब--
वााह...
//जो करते हैं खून ख़राबा जुल्मो सितम
उनके भी दिल में थोडा डर दे मौला.
.//.._उम्मीद है ज़ल्द ही और भी बेहतरीन ग़ज़लों से नवाज़ेंगें।
Comment by SALIM RAZA REWA on January 23, 2016 at 8:58am
आदरणीय शुक्ला जी यक़ीनन आपकी बहुत ही पारखी नज़र है, ग़ज़ल पसंद आई इसके लिए आपको दिली शुक्रिया, नज़रें इनायत... इनायत की नज़र
(चश्मे इनायत - बे शुमार इनायत) करम का फव्वारा, a fountain
बाकी आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया..
Comment by Ravi Shukla on January 22, 2016 at 9:41pm
आदरणीय सलीम रज़ा जी बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने शायद आपकी ग़ज़ल पहली बार पढ़ने का मौका मिला है । मतले से आखिरी शेर तक सुन्दर कथ्य लिया है आपने । एक उत्सुकता है नज़रे इनायत भी कहा जा सकता है आपने चश्मे इनायत लिया है । हालाँकि दोनी के मानी लगभग एक ही है । अगर स्पष्ट करे तो जानकारी में इज़ाफ़ा होगा । सादर

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