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मुझसे ऐ जान-ए-जानाँ क्या हो गई ख़ता है -SALIM RAZA REWA

 221 2122 221 2122
मुझसे ऐ जान-ए-जानाँ क्या हो गई ख़ता है
जो यक-ब-यक ही मुझसे तू हो गया ख़फ़ा है
-
कुछ भी नहीं है शिकवा कुछ भी नहीं शिकायत
क़िस्मत में जो है मेरे  वो मुझको मिल रहा है
-
आंखों में नींद रुख़ पर गेसू बिखर रहे हैं
हिज्र-ए-सनम में शायद वो जागता रहा है
-
शाख़-ए-शजर हैं सूखी मुरझा गई हैं कलियाँ
गुलशन हुआ है वीरां कैसा ग़ज़ब हुआ है
-
इक पल में रूठ जाना इक पल में मान जाना 
उसकी इसी अदा ने दीवाना कर दिया है
-
जब है सज़ा सुनाई दार-ओ-रसन की हमको
फिर पूछते हो क्यूँ अब ख़्वाहिश हमारी क्या है
-
तेरी ख़ुशी में ख़ुश हूँ ग़म में तिरे परेशाँ
मर्ज़ी है जो भी तेरी  मेरी वही रज़ा है
-
दार-ओ-रसन =सूली फाँसी 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on January 15, 2018 at 9:37am
भाई बृजेश जी बहुत बहुत शुक्रिया,
Comment by SALIM RAZA REWA on January 15, 2018 at 9:36am
धन्यवाद सुरेंद्र सिंह जी
Comment by नाथ सोनांचली on January 15, 2018 at 6:00am

आद0 सलीम रज़ा जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने,  बहुत बहुत बधाई, शेष गुनिजनो की बातों का संज्ञान लीजियेगा।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 13, 2018 at 2:02pm

खूबसूरत ग़ज़ल कही आदरणीय सलीम साहब..बधाई

Comment by Samar kabeer on January 12, 2018 at 5:12pm

मक़्ते का ऐब-ए-तनाफ़ुर भी निकालें ।

Comment by SALIM RAZA REWA on January 12, 2018 at 12:18pm
जनाब समर साहब,
ग़ज़ल पे शिरकत के लिए शुक्रिया
. कुछ दब्दीली कर दिए हैं देखिएगा
Comment by SALIM RAZA REWA on January 12, 2018 at 11:48am
सुरेंद्र जी शुक्रिया अर्थ लिख दिया है,
Comment by SALIM RAZA REWA on January 12, 2018 at 11:46am
जनाब आरिफ साहब शुक्रिया,
Comment by Samar kabeer on January 11, 2018 at 5:50pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, बधाई स्वीकार करें ।

हुस्न-ए-मतला में ईता दोष है ।

मक़्ते में ऐब-ए-तनाफ़ुर और शुतरगुर्बा के दोष हैं ।

Comment by surender insan on January 11, 2018 at 4:13pm

वाह जी वाह बहुत बढ़िया ग़ज़ल जी। बधाई स्वीकार करे  जी।

दार ओ रसन का अर्थ बताये जी।

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