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हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।
कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।

हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।
आप का बस इक इशारा चाहिए ।।


हैं टिके रिश्ते सभी दौलत पे जब ।
आपको भी क्या गुजारा चाहिए ।।

है किसी तूफ़ान की आहट यहां ।
कश्तियों को अब किनारा चाहिए ।।

चाँद कायम रह सके जलवा तेरा ।
आसमा में हर सितारा चाहिए ।।

फर्ज उनका है तुम्हें वो काम दें ।
वोट जिनको भी तुम्हारा चाहिए ।।

अब न लॉलीपॉप की चर्चा करें ।
सिर्फ हमको हक़ हमारा चाहिए ।।

कब तलक लुटता रहे इंसान यह ।
अब तरक्की वाली धारा चाहिए ।।

जात मजहब से जरा ऊपर उठो ।
हर जुबाँ पर ये ही नारा चाहिए ।।

अम्न को घर में जला देगा कोई ।
नफरतों का इक शरारा चाहिए ।।

शब्दार्थ - शरारा - चिंगारी
- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 27, 2019 at 9:49pm

आ0 डॉ छोटे लाल सिंह जी हार्दिक आभार।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 27, 2019 at 9:48pm

आ0 सुशील शरण साहब हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 27, 2019 at 9:47pm

आ0 रक्षिता सिंह जी हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 27, 2019 at 9:46pm
आ0 कबीर सर सादर आभार । बहुत सुंदर इस्लाह किया आपने ।
Comment by Rakshita Singh on June 22, 2019 at 11:02pm

आदरणीय नवीन जी नमस्कार,

प्रथम चार पंक्तियाँ बहुत ही शानदार पढकर आनंद आ गया ,बहुत बहुत मुबारक। 

Comment by Samar kabeer on June 22, 2019 at 6:54pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए'

इस मिसरे में 'बहतर' की जगह "हमको" शब्द उचित होगा,विचार करें ।

'चाँद कायम रह सके जलवा तेरा ।
आसमा में हर सितारा चाहिए'

इस शैर के सानी मिसरे में 'हर' शब्द भर्ती का है,और 'आसमा' को "आसमाँ" कर लें 

Comment by Sushil Sarna on June 22, 2019 at 4:29pm

हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।
कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।
हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।
आप का बस इक इशारा चाहिए ।।

वाह आदरणीय वाह बहुत ही उम्दा ग़ज़ल का सृजन हुआ है। दिल से बधाई स्वीकारें।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on June 21, 2019 at 8:01am

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी बहुत ही बेहतरीन गजल वाह मन मगन हो गया , बहुत बहुत बधाई

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