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मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं  (४०)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

.

मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं 
रुख़्सत अगर वतन से हुई भुखमरी नहीं 
**
उल्फ़त जनाब होती नहीं है रियाज़ियात 
चलती है इश्क़ में कोई दानिशवरी * नहीं

**
उम्र-ए-ख़िज़ाँ में आप जतन कुछ भी कीजिये 
नक्श-ओ-निग़ार-ए-रुख़ की कोई इस्तरी नहीं 
**
बरसों से काटती है ग़रीबी में रोज़-ओ-शब
कैसी अवाम है कहे खोटी खरी नहीं
**
घर में न खिड़कियों की ज़रुरत बची है अब
तामीर-ए-नौ में अब कहीं बारहदरी नहीं 
**
दिल पर कभी न मैल कोई जमने दीजिये
जो साफ़ दिल करे वो बनी फ़िटकरी नहीं
**
अब तक किया जो काम हिसाब उसका दीजिये
जनता से कीजिये कोई बाज़ीगरी नहीं
**
लक़ब-ए-सुख़न की आप उमीदें न पालिये 
सरकार की अगर भरी है हाज़री नहीं
**
आपस के मनमुटाव का हल कैसे हो 'तुरंत '
जब तक सुलह के वास्ते बिछती दरी नहीं
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी
२६/०३/२०१९

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 1, 2019 at 9:29am

आदरणीय Samar kabeer साहेब | आदाब | 

बे'पनाह, मुहब्बतों, नवाज़िशों का दिल से बे'हद शुक्रिया ! शाद-औ-आबाद रहें

Comment by Samar kabeer on March 31, 2019 at 11:31am

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी,आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 29, 2019 at 11:38pm

आदरणीय  Hariom Shrivastava जी ,आपकी हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया | 

Comment by Hariom Shrivastava on March 29, 2019 at 12:54pm

वाह,वाहह,बहुत सुंदर ग़ज़ल आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी।

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