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सरदार लाज़मी हो असरदार तो जनाब (३८ )

++ग़ज़ल ++(221 2121 1221 212 /2121 ) 
सरदार लाज़मी हो असरदार तो जनाब 
जो चुन सके अवाम के कुछ ख़ार तो जनाब 
****
ऐसा भी क्या शजर जिसे फूलों से सिर्फ़ इश्क़ 
कोई हो शाख शाख-ए-समरदार* तो जनाब (*फल से लदी डाली )
***
होगा नसीब में कि न हो बात और है 
ता-ज़ीस्त रहती प्यार की दरकार तो जनाब 
***
जज़्बात बर्ग-ए-गुल* से ही होते हैं क़ल्ब में  (*गुलाब की पंखुड़ियां ) 
उगते न इस ज़मीं पे ख़स-ओ-ख़ार* तो जनाब (*घास और कांटे )
***
गुंजाइश-ए-रफू रहे दिल के लिबास में 
ताउम्र हो क़ुबूल न तक़रार तो जनाब 
***
लाज़िम है आँख कान खुले रखिये जानिए 
क्या हो रहा है अब पस-ए-दीवार* तो जनाब(*दीवार के पीछे )
***
कुछ तो निशान छोड़िये क़ायम रहे वज़ूद 
चिल्ला रही है वादी-ए-कोहसार* तो जनाब (*पर्वतमाला )
***
हैरत न हो जो शेर में बू यास्मीन* की (*चमेली का फूल )
पैदा समन* करेगा समन-ज़ार** तो जनाब (*चमेली का फूल **चमेली का बाग़ )
***
मिट्टी में जिस की खेल हुए हम जवाँ 'तुरंत' 
होना वतन पे चाहिए पिंदार* तो जनाब (*गर्व )
***
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 23, 2019 at 8:00pm

आदरणीय समर कबीर साहेब आदाब | आपकी हौसला आफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया | ठीक है सर मैंने सोचा पत्तियां तो पेड़ की होती है गुलाब की तो पंखुड़ियां ही होगीं | 

Comment by Samar kabeer on March 21, 2019 at 12:35pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

जज़्बात बर्ग-ए-गुल* से ही होते हैं क़ल्ब में  (*गुलाब की पंखुड़ियां )'

इस मिसरे में 'बर्ग' का अर्थ 'पत्ता' होता है,पंखुड़ी नहीं,देखियेगा ।

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