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2122 1212 22

खूब सूरत गुनाह कर बैठे ।
हुस्न पर हम निगाह कर बैठे ।।

आप गुजरे गली से जब उनके ।
सारी बस्ती तबाह कर बैठे ।।

कुछ असर हो गया जमाने का ।
ज़ुल्फ़ वो भी सियाह कर बैठे ।।

देख कर जो गए थे गुलशन को ।
आज फूलों की चाह कर बैठे ।।

जख्म दिल का अभी हरा है क्या ।
आप फिर क्यों कराह कर बैठे ।।

किस तरह से जलाएं मेरा घर ।
लोग मुझसे सलाह कर बैठे ।।

लोग नफरत की इस सियासत में ।
आपको बादशाह कर बैठे ।।

दुश्मनी जब चले निभाने हम ।
वो हमें खैरख्वाह कर बैठे ।।

उस जमीं का उदास मंजर था ।
हम जिसे ईदगाह कर बैठे ।।

वो तो सरकार की सियासत थी ।
आप क्यूँ आत्मदाह कर बैठे ।।

अब तस्सल्ली उन्हें मुबारक़ हो ।
मुल्क जो कत्लगाह कर बैठे ।।

उन शहीदों को है सलाम मेरा ।
मौत से जो निक़ाह कर बैठे ।।

सिर्फ पहुँचे वही खुदा तक हैं ।
इश्क़ जो बेपनाह कर बैठे ।।

डॉ - नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 8, 2019 at 4:51pm

आपने छोटी 'ह'(जिसे उर्दू में 'ह' ख़फ़ी कहते हैं) लिए हैं ,और 'सलाह' और 'निकाह' शब्द के अंत में बड़ी 'ह' लिया जाता है,इसलिए उर्दू में इसकी इजाज़त नहीं है ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 7, 2019 at 6:04pm

आ0 कबीर सर क्षमा कीजियेगा आपके नाम के साथ आदर सूचक शब्द टाइप करने में छूट गया है । 

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 7, 2019 at 6:02pm

आ0 कबीर सादर नमन के साथ हार्दिक आभार । कृपया सलाह और निक़ाह उर्दू के हिसाब से कौन सा तकनीकी कारण इस पर भी प्रकाश डालने का कष्ट करें । खुद की जानकारी के लिए आवश्यक समझता हूँ।

सादर 

Comment by Samar kabeer on March 7, 2019 at 2:13pm

जनाब डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'आप गुजरे गली से जब उनके'

इस मिसरे में 'उनके' की जगह "उनकी" कर लें ।

'लोग मुझसे सलाह कर बैठे'

इस मिसरे का क़ाफ़िया उर्दू के हिसाब से ग़लत है,लेकिन देवनागरी में शायद चल जाएगा ।

'उन शहीदों को है सलाम मेरा ।
मौत से जो निक़ाह कर बैठे ।।'

इस शैर के ऊला में तनाफ़ुर देखें,और सानी में 'निकाह'क़ाफ़िया उर्दू के हिसाब से ग़लत है,ऊला यूँ कर सकते हैं:-

'है सलाम उन शहीदों को मेरा'

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 5, 2019 at 9:43pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2019 at 4:12pm

आ. भाई नवीन जी, उम्दा गजल हुयी है । हार्दिक बधाई।

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 5, 2019 at 12:00am

आ0 हरिओम श्रीवास्तव साहब हार्दिक आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 4, 2019 at 11:59pm

आ0 आसिफ़ जैदी साहब तहेदिल से शुक्रिया ।

Comment by Asif zaidi on March 4, 2019 at 11:41pm

आदरणीय क्या कहने अचछे अशआर के बधाई स्वीकार करें सादर

Comment by Hariom Shrivastava on March 4, 2019 at 10:55pm

वाह,वाहह,बेहतरीन ग़ज़ल। खूबसूरत गुनाह..

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