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मापनी २२१ १२२२ २२१ १२२२ 

नफरत के’ किले सारे, हमको ही’ ढहाना है
जो हाथ मिलाया है, तो दिल भी’ मिलाना है

यूँ रोज हमें खलती, पानी की’ कमी बेशक
पर फूल मरुस्थल में, हमको तो’ खिलाना है

वादा जो’ किया तुमने, हर हाल निभा देना,
ये प्यार की’ दुनिया है, चलता न बहाना है

हों लाख कड़े पहरे, दरिया के’ किनारों पर

पर प्रेम के’ दरिया में, डुबकी तो’ लगाना है

खुशियाँ हों’ भले थोड़ी, मिल साथ मना लेना

भरमार दुखों की है, सुख का न ठिकाना है

"मौलिक एवं अप्रकाषित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on December 12, 2018 at 11:36am

आदरणीय PHOOL SINGH जी शुभ प्रभातम, आपकी  हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया

Comment by PHOOL SINGH on December 11, 2018 at 2:15pm

क्या बात है सर जी बहुत सूंदर बधाई 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on December 9, 2018 at 9:27pm

आदरणीय राज़ नवादवी जी शुभ संध्या, आपकी हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on December 9, 2018 at 9:27pm

आदरणीय समर कबीर जी सादर नमस्कार, मैं आपका इशारा समझ गया, अवश्य प्रयास करता हूँ, यइसी तरह स्नेह बनाये रखें 

Comment by राज़ नवादवी on December 7, 2018 at 9:16pm

आदरणीय बसंत कुमार जी, आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए मुबारकबाद. सादर. 

Comment by Samar kabeer on December 7, 2018 at 8:52pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है,बधाई स्वीकार करें ।

थोड़ा शिल्प पर अभ्यास करें ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on December 7, 2018 at 4:20pm
आदरणीय TEJ VEER SINGH जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाअफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by TEJ VEER SINGH on December 7, 2018 at 10:56am

हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी।बेहतरीन गज़ल।

हों लाख कड़े पहरे, दरिया के’ किनारों पर

पर प्रेम के’ दरिया में, डुबकी तो’ लगाना है

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