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दो कवितायें मुक्तछंद

मौसम

धूप की तपन

विदा होने को तैयार

नन्ही कोपलों के फूटने का

पौधों को इंतजार

छांह को ढोते बादल

अब बूंदें चुराएँगे

इस कालचक्र के बीच

मौसम बदल जाएंगे ।

 

सीप

 

चमकते मोती

पलते सीप के सीने में

पिरोये जाकर धागों में

शोभा बढ़ाते गले की शान से

छुपाकर रखा मोती को

दर्द सजाकर सीने में

छाती चीरकर दिया उपहार

विस्मृत रहा फिर भी

हमेशा ही सीप

 

... मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2018 at 5:50pm

आदरणीया नीलम जी अति सुंदर रचनाएँ हैं ..दूसरी रचना बहुत अच्छी लगी ...समाज की बास्त्विकता को उजागर करती शानदार रचना ..इस रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें  सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 8, 2018 at 8:29pm

बहुत सुन्दर भाव भरी कवितायेँ आदरणीया...

Comment by Neelam Upadhyaya on October 8, 2018 at 11:44am

आदरणीय तेजवीर सिंह जी, कविता पर समय देने के लिए बहुत बहुत आभार।  

Comment by Neelam Upadhyaya on October 8, 2018 at 11:43am

आदरणीय  लक्ष्मण धामी जी, उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत आभार।  

Comment by Neelam Upadhyaya on October 8, 2018 at 11:42am

आदरणीय  डॉ छोटे लाल  जी, उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत आभार।  

Comment by Neelam Upadhyaya on October 8, 2018 at 11:41am

आदरणीय श्याम जी, उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत आभार।  

Comment by Neelam Upadhyaya on October 8, 2018 at 11:40am

आदरणीय समर कबीर जी,  कविता के लिए समय देने के लिए बहुत बहुत आभार।  पोस्ट में करेक्शन करने का प्रयास किया। लेकिन इस मामले में मैं अधिक सिद्धहस्त नहीं हूँ।  अतः वर्तनी में सुधार  कर उसे पुनः पोस्ट नहीं कर पा रही हूँ।  आप मुझे गाइड करें। 
 

Comment by Neelam Upadhyaya on October 8, 2018 at 11:31am

आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी, कविता के लिए समय देने के लिए धन्यवाद। 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 7, 2018 at 10:40am

हार्दिक बधाई आदरणीय नीलम जी। बेहतरीन कवितायें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 7, 2018 at 5:23am

आ. नीलम जी , सुंदर रचनायें हुयी हैं । हार्दिक बधाई।

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