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ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश

ये हवा कैसी चली है आजकल
सब यहाँ दिखते दुखी हैं आजकल

दुख किसीको है अकेला क्यों खड़ा
और किसीको भीड का ग़म आजकल

है शिकायत नौजवाँ को बाप से
बाप को लगता वो बिगड़ा आजकल

मायने हर चीज के बदले यहाँ

है नहीं अच्छा बुरा कुछ आजकल

बाँटकर खाने के दिन वो लद गये

लूटलो जितना सको बस आजकल

मुल्क के ख़ातिर गँवाते जान थे

क़त्ल करते मुल्कमें ही आजकल

क़ौल के ख़ातिर गँवायें जान क्यों

कौन है वादे निभाता आजकल

ताज भी छोड़ा किसीने शान में
कौन छोड़ेगा ये कुर्सी आजकल

सिर्फ़ मसला ये नहीं लिबास का
देखना बाक़ी रहा क्या आजकल

तुम भले चाहे गँवादो जान भी
बस यही होता रहेगा आजकल

मौलिक एवं अप्रकाशित। 

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Comment

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Comment by Kishorekant on August 11, 2018 at 5:37am

आदरणीय समर कबीरजी

आपकी सुचनाओं का ध्यान रक्खूंगा ।

OBO पर इतने सौहार्द पूर्ण वातावरणमें उचित मार्गदर्शन मेरे अहोभाग्य का विषय है !

गुणी जनों का सहयोग मिलता रहा तो कुछ न कुछ सीख ही जाऊँगा । 

आभार !

Comment by Kishorekant on August 11, 2018 at 5:31am

आदरणीय रविकान्त जी ,

आपके मार्गदर्शन का बहुत बहुत आभार ।आगके लिये ये सुचनायें काफ़ी सहायक होगी ।

Comment by Ravi Shukla on August 11, 2018 at 12:03am

आदरणीय किशाेरकांत जी  आे बी आे पर गजल की बातें एवं गजलकी कक्षा से मूल भूत जानकारी लेकर आगे बढे बहर अौर काफिया गजल का मूल भूत तत्व है इसके  बिना गजल नहीं हो सकती । अब मेरे द्वारा उठाए गये दो शब्द खािलाफत को  विरोघ के अर्थ में नहीं प्रयुक्त कियाजाना चाहिये उसके  लिए मुखालिफ लफ्ज है आेर मसला की जगह  मसअला 212 के वजन में  लियाजाएगा । सादर 

Comment by Samar kabeer on August 7, 2018 at 2:15pm

जनाब किशोर कांत जी आदाब, अव्वल तो ये ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल नहीं है,दूसरी बात ये कि ये ग़ज़ल भी नहीं है,क्योंकि बिना रदीफ़ की ग़ज़ल हो सकती है,लेकिन बिना क़वाफ़ी की ग़ज़ल नहीं होती,और आपकी इस प्रस्तुति में रदीफ़ तो है, क़वाफ़ी नहीं है,अगर ग़ज़ल विधा पर क़लम चलाना है तो उसके लिए बहुत अध्यन करना होगा,ओबीओ पर इस विधा पर बहुत से आलेख हैं,उन का लाभ लें ।

Comment by Kishorekant on August 7, 2018 at 8:32am

तस्दिक अहमद खाए साहब

हौसला अफ़्जाई का तहें दिलसे शुक्रिया । सीखने सीखाने के सिलसिलेमें आपका  सहयोग अवश्य दें ।

Comment by Kishorekant on August 7, 2018 at 8:28am

आदरणीय रवि शुक्लाजी,

'फ'के ऊपर रेफ के कारण मैंने  सि को गुरु (२) किया है  सिर्फ़ = सिर फ

  1. सिर्फ़ मसला
  2. २  १  २ २

ख़िलाफ़त में ......के स्थान पर  ........भले चाहे  .....कर दिया है ?

आपका आभार एवं  सहायता की प्रार्थना ।

Comment by Kishorekant on August 7, 2018 at 8:13am

आदरणीय नविनमणी त्रिपाठी जी,

आपका मार्गदर्शन मूल्यवान है ।

मतलेमें है और हैं (.) का भेद है ।

काफिया  निभाते नहीं बन पड़ा था इसलिये आजकल को क़ाफ़िया बनाकर   ग़ैर मुर्रदफ कहा ।क़ाफ़िये की खोजमें रचना का प्रस्तुत रूप ही  बदल जायेगा।

ईसी कहन को  स्विकार्य रूप कैसे  दे सकते हैं, कृपया मार्गदर्शन करें ।

अभी विद्यार्थी ही हूँ ।

आदरणीय रवि शुक्लाजी भी अनुग्रह करें । ख़िलाफ़त एवं मसला में सुधार कर दूँगा ।

Comment by Ravi Shukla on August 6, 2018 at 11:37pm

आदरणीय किशोर कांत जी प्रयास अच्छा हुआ है  मतले मे काफिया आैर रदीफ दोनो ही है  आैर पूरी गजल में आजकल रदीफ चल रहाहै इसलिए गैर मुरद्दफ नहीं हुई है गजल साथाही आपने अरकान भी नहीं लिखे है । लफ्ज  खिलाफत अर्थ में आैर मसला वज्न के अनुसार  फिर से देख लें ।सादर 

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 6, 2018 at 10:39pm

जनाब किशोर कान्त साहब बहुत सुंदर प्रयास है ग़ज़ल का ।ग़ज़ल गैर मुदर्र्फ कैसे हुई रदीफ़ तो आजकल है । 

कृपया ध्यान दे...

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